कान्ता रॉय से संतोष सुपेकर की बातचीत (साभार : पुस्तक, उत्कंठा के चलते - संतोष सुपेकर)

 कान्ता रॉय से संतोष सुपेकर की बातचीत (साभार : पुस्तक, उत्कंठा के चलते - संतोष सुपेकर)


संतोष सुपेकर- समकालीन लघुकथा को पचास वर्ष बीत चुके हैं, लघुकथा को आप आज कहाँ पाती हैं?

कान्ता रॉय  – आश्चर्य होता है उन पचास सालों पर जो बीत चुके हैं| पचास साल कम तो नहीं होते है न! मेरे इस आश्चर्य करने के पीछे कई कारण हैं| समकालीन लघुकथा को पचास वर्ष बीत जाने के बाद भी लघुकथा अपना प्रथम पायदान पार नहीं कर पाई} अब तक वह प्रथम चरण में ही अटकी हुई है| यह जरूर है कि लघुकथा को पहचान मिल गई| आज पाठक और लेखक दोनों लघुकथा और कहानी में फर्क समझने लगे हैं| कथा साहित्य में लघुकथा ने अपना स्थान अपनी पहचान बना तो ली है लेकिन यह सिर्फ अभी लेखकों और पाठकों तक ही सीमित है| पचास वर्ष आंदोलन के बीत जाने के बाद भी यह विश्वविद्यालय तक नहीं पहुंच पाई है| राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में यह अकादमी में गरिमापूर्ण तरीके से अपना स्थान नहीं बना पायी है| दिल्ली में सन 2016 में रचनापाठ का एक आयोजन हुआ भी लेकिन फिर उसे दुबारा नहीं बुलाया गया| इसके पीछे के कारणों को तलासना होगा| आखिर हम कहाँ और क्यों छूट रहें हैं! मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा जैनेन्द्र कुमार के नाम से पचास हजार रुपये का सम्मान स्थापित हो चुका है, इसका अनुसरण भारत के अन्य राज्यों में हो एवं अखिल भारतीय पुरस्कारों की सूची में अपना स्थान बनाने के लिए लघुकथा के लेखक लेखन के साथ अपनी गरिमापूर्ण छवि भी बनाने का प्रयास करें| लघुकथा में के लिए पिछले पचास वर्षों में जितना काम हुआ है वह संतुष्टिदायक नहीं है| लघुकथा को व्यापकता देने के लिए अभी बहुत काम बाकी है| लघुकथा के लेखक, आलोचक एवं संपादकों को जो लघुकथा के प्रति समर्पित भाव रखते हैं उनको इन विषयों पर अवश्य सोचना चाहिए कि पचास वर्ष बीतने के बाद भी लघुकथा का इतिहास क्यों अब तक नहीं लिखा जा सका? लघुकथा का सौंदर्यशास्त्र, उसका अनुशीलन अब तक क्यों नहीं लिखा गया? इन प्रश्नों को उठाने के पीछे कारण यह है कि अगर आज हम किसी विश्वविद्यालय में लघुकथा विषय को शामिल करने की बात उठायेंगे तो इसका आधार क्या होगा? हमारे पास इस तरह की कोई किताब नहीं है जिससे विश्वविद्यालय में लघुकथा का सिलेबस तैयार हो| जिस प्रकार से कविता, कहानी, उपन्यास सहित अन्य विधाओं की पुस्तकें हैं, एम.ए. में विषयानुसार पढाये जाने योग्य लघुकथा में पुस्तकों की कमी है| पिछले पचास वर्षों में लघुकथा के लेखक, विचारक, चिंतक सिर्फ लघुकथा संकलन, समीक्षा, भूमिका और अपनी संग्रह के प्रकाशन तक सिमट कर रह गए| लघुकथा के विमर्शकारों को जरूरत है कि वे आगे आएं, लघुकथा के इतिहास पर कम से कम चार-पांच प्रकार से पुस्तकें तैयार करें| बहुत जरूरी है कि लेखक इसमें अपना-अपना योगदान दें, आगे आए और इस दिशा में काम करें।

संतोष सुपेकर - आप स्वयं एक सशक्त लघुकथाकार रही हैं। ‘लघुकथा वृत्त’ और अन्य कई संकलनों के जरिये आपने लघुकथा को भरपूर महत्व, प्रोत्साहन दिया है। एक सम्पादक के रूप में लघुकथा का चयन आप किस तरह करती हैं? कहने का आशय कि चयन करते समय आप लघुकथा के स्थापित मापदंडों पर आधारित लघुकथा को वरीयता देती हैं या अपनी व्यक्तिगत पसंद को?

कान्ता रॉय  – ‘लघुकथा वृत्त’ के अगस्त 2021 अंक आते-आते इसके 35 अंकों का संपादन कर चुकी हूँ अर्थात 35 अंक प्रकाशित हो चुके हैं| लघुकथा संकलनों में नए-पुराने लेखकों को लेकर तीन पत्रिका के लघुकथा विशेषांकों का एवं करीब आठ लघुकथा संकलन जिसमें करीब 800 से ऊपर रचनाकार शामिल हैं का संपादन भी कर चुकी हूँ, इस अर्थ में आपका मुझसे किया गया यह सवाल उचित प्रतीत हुआ| आपका प्रश्न एक संपादक के रूप में लघुकथा का चयन को लेकर है तो मैं बताना चाहूँगी कि लघुकथा का चयन करते हुए मैं सबसे पहले कथ्य देखती हूँ| कथ्य में निहित सामाजिकता पर विचार करती हूँ| रचना का  उद्देश्य देखती हूँ| जब भी कोई लघुकथा मेरे सामने आती है तो समाज में उसकी उपादेयता सबसे पहले मेरे मन में कौंधती है| पाठकों के हृदय में करुणा जागृत करने वाली लघुकथा ही सार्थक लघुकथा है| अगर लघुकथा का कथ्य मौलिक है तो पहली बार पाठक उस पर पढ़ते ही विचार करेगा। रचना की मौलिकता मेरे लिए महत्वपूर्ण है| अपनी व्यक्तिगत पसंद-नापसंदगी को कभी रचना चयन में हावी नहीं होने देती| अगर रचना किसी खास वर्ग को प्रभावित करने में सक्षम है तो वह प्रकाशन योग्य मानती हूँ| कई बार नए रचनाकार अपनी रचनाओं के माध्यम से कुछ महत्वपूर्ण बात कहने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह सुगढ़ नहीं बन पाती, कहीं ना कहीं एक कच्चापन सा रहता है, प्रस्तुति कमजोर रहती है तो एक संपादक होने के नाते मैं अनावश्यक चीजों को हटाकर उसके मूल भाव और मूल प्रस्तुति से छेड़छाड़ ना करते सही प्रारूप में डालने की कोशिश करते हुए अपने प्रकाशन के योग्य तैयार करती हूँ जो उक्त पत्रिका के अनुकूल हो| अगर उसका भाव सही है उसका उद्देश्य सही है और अस्सी प्रतिशत तक  प्रस्तुति सही है तो दस से बीस प्रतिशत तक सम्पादित कर अपने सम्पादकीय दायित्व का निर्वाह करती हूँ| एक बात विशेष तौर पर कहना है कि संपादन का अर्थ पुनर्लेखन नहीं होता है और यह किसी भी संपादक को नहीं करना चाहिए| संपादक द्वारा रचना का मात्र संपादन किया जाता है| अगर किसी रचना का पुनर्लेखन करवाना है तो यह लेखक से ही करवाना उचित होगा| इस तरह नए लेखकों को प्रोत्साहन देने का भी काम भी संपादक का दायित्व है| बहुत जरूरी है कि नई संभावनाएँ, नए लेखन को महत्व दिया जाए, प्रोत्साहन किया जाए ताकि लघुकथा में एक नई जमीन की संभावना बनी रहे| ढर्रे में बंधी लघुकथा से लघुकथा का विकास संभव नहीं है| 

संतोष सुपेकर - कई लघुकथाओं में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य, एक दो शब्दों, वाक्यों में सिमटे  रहते है लेकिन इन पर पाठकों, समीक्षकों का ध्यान कम ही जाता है उदाहरणार्थ श्यामसुंदर अग्रवालजी की लघुकथा 'संतू' में प्रारम्भ में ही लेखक ने लिखा है 'पैरों में बेनाप के बूट डाले सीधा साधा संतू.. 'इस रचना में मेरे विचार से इस बेनाप के बूटसे काफी कुछ पता चलता है। लेखक ने इन शब्दों के उपयोग से गागर में सागर भर दिया है लेकिन कम समीक्षकों का ध्यान इस पर गया है। इसी प्रकार मेरी लघुकथा 'नया अन्वेषण 'को बहुत अच्छा प्रतिसाद मिला लेकिन इसमे आए वाक्य 'उसका स्वर धीमा हो गया और मुस्कान कुछ तीखी..'पर मुझे समीक्षकों से काफी उम्मीद थी ...आपके विचार?

कान्ता रॉय  – यह आपने बिल्कुल सही प्रश्न किया है| कई बार शब्दों के नेपथ्य में जो अर्थ छुपे होते हैं जो लघुकथा को अर्थ के साथ सौंदर्य प्रदान करती है उसे सरसरी नजरों से पढ़े जाने पर छूट जाने का भय बना होता है| लघुकथा स्थूल रूप में शब्दों में कम एवं अंतर्द्वंद में अधिक खुलती प्रतीत होती है| एक अच्छी लघुकथा में कई अर्थ छुपे हुए होते हैं| लघुकथा बाहर की तरफ कम और अंदर की तरफ अधिक खुलती है| लघुकथा का यही सौंदर्य है। हम सब जानते हैं कि लघुकथा एक गंभीर बात को कहने की विधा है हालांकि आजकल हल्की-फुल्की रोचक ढंग की लघुकथाएँ भी व्यंग्यात्मक शैली में पढ़ने को मिल रहा है| चिंतन इसके मूल प्रवृत्ति है| लेखक और पाठक दोनों का चिंतनशील होना बहुत जरूरी है| लघुकथा में सामाजिक चेतना को जागृत करने के लिए प्रस्तुती के लिए कई शैलियाँ नई विकसित हुई हैं| तर्क पूर्ण तरीके से क्रमबद्ध विचार रखने की कला लघुकथा है| आपने ‘बेनाप के जूते’ के प्रयोग का जिक्र किया है, इसके अलावा भी कई उदाहरण है। जैसे कि आपकी यानि कि संतोष सुपेकर की एक लघुकथा का शीर्षक ‘सौ डिग्री का जवाब’ को ही ले लीजिये| पाठकों ने करुणा को ग्रहण किया लेकिन शीर्षक में छुपे गहन अर्थ को टटोलने की जरुरत नहीं समझा पाठकों ने| ‘व्रती’, ‘तमाशबीन’ जैसी मेरी कई लघुकथाएँ हैं जिन्हें पाठकों ने स्थूल रूप में ग्रहण किया और लघुकथा को सही अर्थों में ग्रहण नहीं कर सकी। मुझे तो लगता है यह लगभग हर अच्छे लघुकथाकारों का दर्द है। अच्छी लघुकथा संक्षिप्त और गूढ़ बुनावट लिए होती हैं| वह अव्यक्त को व्यक्त करने के उद्देश्य से लिखी जाती हैं| वे रचनाएँ रहस्य में छायावादी कविताओं के समकक्ष खड़ी होती हैं उनको समझने के लिए एक समर्थ चिन्तक की दृष्टि की आवश्यकता पड़ती है|   


संतोष सुपेकर- सन साठ-सत्तर के पहले की लघुकथा, लघुकथा थी या नही इस बहस से आज की लघुकथा को कितना लाभ है?

कान्ता रॉय  - सन साठ-सत्तर दशक के पहले की लघुकथा लघुकथा थी या नहीं इस बहस से आज की लघुकथा को कोई लाभ नहीं है| यह व्यर्थ की चर्चा है| आलोचना की दृष्टि में अगर तुलनात्मक अध्ययन करें कि हमारा इतिहास क्या रहा है, हमने किस परिपाटी को अपनाया है, पहले की कथाओं में जो पंचतंत्र हितोपदेश या बीसवीं शताब्दी के शुरुआत में लिखी गई, हम ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ की बात करते हैं, माखनलाल चतुर्वेदी की ‘बिल्ली और बुखार’ या ‘झलमला’, परसाई की लघुकथा की बात करते हैं या उपेंद्रनाथ ‘अश्क’ की, अयोध्या प्रसाद गोयल, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ सहित नामों की एक लम्बी फेहरिस्त है इसमें प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भवभूति मिश्र इत्यादि की लघुकथाएं है जिन्हें हम आज के संदर्भ से जोड़ सकते हैं| 

बहस निर्भर करता है कि यह किस दिशा में, किस उद्देश्य से किया जा रहा है| चर्चाओं को प्रोत्साहन देने की जरुरत है| उससे हमें लेखन का उद्देश्य क्या रहा होगा, जब वह कथाएं लिखी गई होंगी उस समय का सामाजिक दबाव, समाज में हो रहे परिवर्तन, उसके  पाठकों की प्रतिक्रियाएं, किस कारण से वे लघुकथाएं कहानी के दौर में अपना स्थान बनाए रखने में सफल हो पायीं| हमें समालोचना की दृष्टि से हमें उन चीजों का अध्ययन जरूर करना चाहिए कि जब जयशंकर प्रसाद जी पच्चीस-तीस पन्नों की कहानियां लिख रहे थे, जब ‘गोदान’, ‘कफ़न’ लिखा जा रहा था उस वक्त ‘बाबा जी का भोग’ ने अपना स्थान किस तरह बचा के रखा? क्या कारण रहा होगा कि ‘कलावती की शिक्षा’ जैसी लघुकथाएं अपना स्थान बनाने में कामयाब रही| क्या रहा होगा उस वक्त का वर्तमान? उस समय का पाठक क्या चाहता था, क्या पढ़ना चाहता था, क्या समझना चाहता था और आज के जो पाठक है वे क्या पढ़ना चाहते हैं? बदलाव के सारे चिन्हों को निश्चित करने से अवश्य लाभ मिलेगा| चिंतन में, लेखन में बदलाव आया है साथ ही पाठकों के ग्रहण करने की क्षमता में भी बदलाव आया है| इन बदलावों के अध्ययन के लिए जरूरी है कि हम सत्तर एवं उससे पहले की लिखी गई लघुकथाओं को वर्तमान संदर्भ से जोड़कर देखें, आलोचना करें| लघुकथा का आलोचना-शास्त्र और इतिहास तभी मजबूत हो पाएगा जब हम लिखे गए उन सभी लघुकथाओं को साथ लेकर चलेंगे, अन्यथा लघुकथा का इतिहास, उसकी यात्रा का कभी सही आकलन, मूल्यांकन नहीं हो पाएगा|

बहस से लाभ होने की बात पर यही कहना है कि किसी भी बहस को वह आकलन हो या समालोचना अगर आप सकारात्मक रूप से उसे देखेंगे तो वह विकास के दृष्टि से लाभदायक साबित होगा| अगर कटु आलोचना ही करनी है तो फिर बहस निरर्थक है| बहस से कोई एक दिशा निकल कर आना चाहिए| सत्तर के पहले की लघुकथा में दिशा क्या थी, उसके बाद जो लघुकथाएं लिखी गई आंदोलन के उपरांत, उसकी दिशा क्या थी और इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश करते-करते उसकी दिशा क्या हो गई...| इस बात को विशेष तौर पर रेखांकित करना चाहूंगी कि सोशल मिडिया पर जब लघुकथा आई तभी माहौल की गर्मी से प्रभावित होकर बड़े ही उत्साहपूर्ण तरीके से मधुदीप गुप्ता की नई पारी शुरू हुई थी जिसके फलस्वरूप पड़ाव और पड़ताल के तीस से अधिक खंड तथा अन्य सामग्रियों के रूप में लघुकथा का समग्रीकरण करते हुए महत्वपूर्ण दस्तावेज वर्तमान को प्राप्त हो सका| सन 2014 ईस्वी के बाद लघुकथा किस दिशा की ओर जा रही है, हम सब चीजों का आकलन अगर निश्छल मन और सकारात्मक भाव से करें तो आने वाले समय में हमें एक नए शिल्प नए-नए मिजाज की लघुकथाएं भी देखने को मिलेंगी| विकास के क्रम में यह लघुकथा को नए आयाम देने में सफल हो सकती है| तो सब बातों का सार यही है कि बहस तो होनी चाहिए| लेकिन वह अच्छे के लिए होनी चाहिए, किसी को गलत साबित करने के लिए बहस नहीं होना चाहिए| पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर अगर हम किसी भी बहस में भाग लेते हैं तो उसका परिणाम हमेशा नकारात्मक ही निकलेगा| इसीलिए सत्तर के पहले की लघुकथा और उसके बाद की लघुकथा और वर्तमान की लघुकथा, तीनों का मूल्यांकन करें| तीनों के गुण और दोष पहचाने और भविष्य के लिए प्रस्थान करें| वह निश्चित ही लघुकथा के लिए नवीन मार्ग प्रशस्त करेगी| 

संतोष सुपेकर - अभी भी पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथा 'फिलर 'के रूप में उपयोग की जा रही है? स्थान समायोजन के लिए लघुकथा के स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है। इससे लघुकथा को हो रही हानि पर आपके विचार?

कान्ता रॉय  - पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथा फिलर के रूप में उपयोग होना दुखद है| यह सत्य है कि स्थान समायोजन के लिए कई बार लघुकथा के स्वरूप से छेड़छाड़ भी की जाती और लघुकथा ही नहीं बल्कि मैंने तो अच्छी पत्रिकाओं में जो राष्ट्रीय स्तर की हैं उनमें अच्छी समीक्षाओं को भी कतर दिया जाता है| कई बार तो संपादक इस तरह से क़तर देते हैं कि आलोचना का जो मुख्य बिंदु, केन्द्रीय भाव है वह लुप्तप्राय हो जाता है| कई बार बड़ी कहानियों के प्रकाशन में भी ऐसा होता है कि 8-10 पन्ने की कहानी है और इसको 5-6 पन्ने में ही लेना है| इसमें कभी-कभी रचना की आत्मा ही कट जाती है| भूमिका हटाने के चक्कर में कहानी का परिवेश कथा से छूट जाता है, पढ़ते हुए पाठक उस भाव को ग्रहण नहीं कर पाता जिसके लिए रचना की गयी है| ख़ास कर लघुकथा में तो एक शब्द में विस्तृत नेपथ्य को बुन दिया जाता है| 

कई संपादक ऐसा आग्रह भी रखते हैं कि लघुकथा एक पन्ने की हो| डिमाई आकार के एक पन्ने में लगभग 300 शब्द आते हैं लेकिन अगर रचना संवाद शैली में है तो शब्द गिनती में तो कम होंगे क्योंकि वहाँ पंक्तियों में ही पन्ने भर जाते हैं| अब संवाद अधिक है तो आपको एक पन्ने से तो बढ़ाना ही होगा| इसलिए साहित्य में रचनाओं के प्रति ऐसे आग्रह को दुराग्रह मानती हूँ| यह साहित्य में चिंतन, लेखक के विचार की हानि तो है ही लेखक के श्रम की भी हानि है| एक संपादक होने के नाते मैं ऐसा मानती हूँ कि अगर आपके पास जगह नहीं है तो आप प्रकाशित न करें| आपको लेना है तो फिर मूल रूप से ही प्रकाशित करें| हाँ, यह हो सकता है कि अगर रचना को कतरना जरूरी लग रहा है तो उस लेखक से ही आग्रह कीजिये| जैसा कि मैंने ऊपर भी कहा है संपादक का अधिकार बीस प्रतिशत से अधिक संपादन का नहीं होना चाहिए| पुराने, सिद्धहस्त कथाकारों की रचनाएँ मूल स्वरुप में ही प्रकाशित होना चाहिए| जहां तक बात है पत्र-पत्रिकाओं में लघुकथा के नाम से अन्य छोटी कथाओं का प्रकाशन बहुत दुखद है| इससे विधा का बड़ा नुक्सान उठाना पद रहा है| जिस संचेतना के लिए प्रयास में हम गोष्ठियाँ और सम्मेलनों के संशाधन जुटाते फिरते हैं, विमर्शों पर काम करते हैं| उन सारे प्रयासों पर नामचीन पत्र-पत्रिका पानी फेर देते हैं| विधा का रूप बिगाड़ने में इन सबका बड़ा हाथ है| 

पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ते हुए यह ज्ञात होता है कि संपादक अभी भी लघुकथा को विधा के रूप में स्वीकार नहीं कर पाएं हैं। कई बार बड़े पत्र-पत्रिकाओं में संपादक लघुकथा के प्रति अपनी उदारता दिखाते तो हैं लेकिन वे स्वयं इस विधा के कलेवर से अनजान हैं| उनके कार्यालय में अन्य सहयोगी भी इसमें रूचि नहीं दिखाते हैं| कई बार लघुकथा प्रकाशन हेतु संपादक भी बाध्य हो जाता है| पाठकों की मांग बन गयी है लघुकथा| पाठकों की रूचि है इसलिए लेखकों में रुझान पैदा हो रहा है ऐसे में संपादक महोदय भी कहां तक बच पायेंगे| फिलर के रूप में ही सही लघुकथा के बिना पत्र-पत्रिका अपूर्ण साबित हो रही है| ऐसे में लघुकथा का हौसला बढ़ना चाहिए| इसे हम सकारात्मक दिशा में प्राप्त परिणाम मान कर चलें| वीना, अक्षरा, भारतीय समकालीन साहित्य इत्यादि राष्ट्रीय स्तर के पत्र पत्रिकाएं हैं वह अब लघुकथा को प्रमुखता से लेने लगे हैं तो यह एक अच्छा संकेत है और आशा करती हूँ कि आगे आने वाले दिनों में जो थोड़ी बहुत हिचक है वह भी टूट जायेगी| ‘हंस’ जैसी पत्रिकाओं से भी आग्रह है कि वे आगे बढ़े और फिलर के रूप में लघुकथा ना प्रकाशित करके पूरे पन्ने पर कम से कम दो-तीन लघुकथाएं एक साथ प्रकाशित करें| 

संतोष सुपेकर -  हिंदी लघुकथाओं में अंग्रेजी शीर्षक / रचना में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग (संवादों में नही, लेखक की ओर से) क्या रचना को वाकई पाठक /  समीक्षक की ओर अधिक आकर्षित करते हैं?

कान्ता रॉय  - यह प्रश्न सिर्फ लघुकथा के लिए नहीं है| हिंदी साहित्य के सभी विधाओं पर हिंदी लेखन के लिए भी यह प्रश्न है कि अंग्रेजी शीर्षक या रचना में अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कहाँ तक उचित है? संवादों में पात्र का व्यक्तित्व हावी रहता है| उस हिसाब से वह ठीक भी है| अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग होने से पाठक या समीक्षक का ध्यान अधिक आकर्षित करने वाली बात पर मैं सहमत नहीं हूँ| असल में अंग्रेजी के कुछ शब्द ऐसे हैं जो हमारे हिंदी में अनधिकृत रूप से घुस गए है| अर्थात हमारी बोलचाल की, रोजमर्रा की जो भाषा है उसमें वह बैठ गई है| बैठ भी इस प्रकार से गई है, जैसे हिंदी जुबान में उर्दू के शब्दों का बैठ जाना| हिंदी एक ऐसी भाषा है जो बाहर के बोलियों को, उनके शब्दों को एकदम से आत्मसात कर लेती है और उनके साथ ऐसे घुल-मिल जाती हैं कि पता ही नहीं चलता है कि यह हिंदी नहीं है, तो कहने का आशय यह है जिस तरह से हम उर्दू के शब्दों को हिंदी से अलग नहीं कर सकते, भविष्य में ऐसा वक्त अंग्रेजी के शब्दों के साथ भी आएगा| ये शब्द ऐसे होंगे जो हिंदी में फिट हो जाएंगे फिर उसको निकालना मुश्किल हो जाएगा| अभी भी आप ऐसे कई शब्द पाएंगे जैसे कि मोबाइल, रेल, एंटीना इत्यादि| अब दिनचर्या में से रेजर और ब्लेड को कैसे निकाल कर फेंके? वर्तमान समय की जो भाषा है वह जन सामान्य की है| रचना के माध्यम से पाठकों से जब लेखक संवाद स्थापित करेगा तो उन्हीं भाषाओं का उपयोग करेगा क्योंकि वह भी उसी समाज का हिस्सा है| वर्तमान समाज की जो बोली है उसको ग्रहण करते हुए अवचेतनता में प्रवाह में लिखता चला जाता है| उचित शब्द अपने आप अपनी-अपनी जगह पर फिट होते चले जाते हैं| हिंदी के शब्द विचार के संदर्भ में मैं यह बात कह रही हूँ कि शीर्षक बहुत सोच-विचार के रखा जाता है| हिन्दी हो या अन्य कोई भाषा, उनके शब्द विशिष्ट होते हैं उनकी अपनी एक विशेष प्रकार की खुशबू होती है जिसको ध्वनि भी कहते हैं, इसके अर्थ और रसानुभूति भी विशेष प्रकार की होती है जिसे मैं स्वाद कहती हूँ| भाषा अपने समय का दस्तावेज होता है| भाषा में समय का दबाव, जीवन का व्यवहार छिपा होता है इसीलिए जिस व्यवहार को जी रहे हैं उसको ठीक उसी व्यवहार से दस्तावेज बनाया जाना चाहिए ताकि आने वाले वर्षों में जब लोग पलट के पीछे देखे तो उनको भाषा के माध्यम से समय का सही-सही प्रमाण मिल सके, वातावरण और वस्तुस्थिति का सही ज्ञान वे प्राप्त कर सके| इसके लिए बहुत जरूरी है कि जो हमारी बोली है हम उसी को प्रस्तुत करें और आज यह सत्य सबको स्वीकार कर लेना चाहिए कि अंग्रेजी के शब्द जिसे अब हम हिंदी में घुसपैठिया मान रहे है के शिकार हो चुके हैं| बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में जब पश्चिम के साहित्य का अनुकरण करते हुए शार्ट स्टोरी से हिन्दी कहानी ने अस्तित्व ग्रहण किया था उसी समय भारतीय संस्कार ने दबे-छुपे अंग्रेजी शब्दों को समाहित कर लिया| भारतेन्दुकालीन खड़ी बोली के रचनाकारों सहित महावीर प्रसाद द्विवेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद्र, प्रसाद, हरिवंशराय बच्चन, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी सहित अनेकों आधुनिक काल के साहित्यकारों जो आरम्भिक काल से ही हिन्दी के प्रति सावधान रहे फिर भी वे इससे बच नहीं पाए तथा बचा भी नहीं पाए| हिन्दी फिल्मों के लिए पटकथा लिखने वाले हिन्दी साहित्य के नामचीन साहित्यकार ही रहें है| शरतचंद्र का देवदास जब कलकत्ता पढने जाता है तो विदेशी संस्कार लेकर घर लौटता है| देवदास की परिकल्पना कोरी तो नहीं रही होगी, निश्चित तौर पर कोई विलायती पढ़ कर आया उनके जेहन में रहा होगा| किसान, मजदूर, स्त्री सहित सर्वहारा वर्ग के साहित्यकार की रचनाओं में अंग्रेजीयत की गूँज कहाँ तक ध्वनित हुआ ये उन दिनों के साहित्य को पढ़कर जाना ही जा सकता है| वक्त रेत के सामान ही होता है जितना अधिक कसेंगे उतनी ही अधिक गति से फिसलता चला जाएगा| अब तो भूमंडलीकरण का दौर आ चुका है और पूरी मानव सभ्यता मुटठी में बंद टेक्नोलॉजी के अधीन हो गयी है| समय हमारे हाथ से निकल चुका है| हम इसको चाह कर भी नहीं रोक सकते| लेखक अपना दायित्व समझते हुए जहां तक हो भरसक हिन्दी के शब्दों के प्रयोग पर सावधानी बरतें| कोशिश करनी चाहिए हिंदी के प्रयोग के लेकिन हास्यास्पद स्थिति ना बन जाए इसीलिए जरूरी है कि आपको जहां उचित लगे वहां अंग्रेजी प्रयोग भी कीजिए इसके लिए कोई मनाही नहीं है मुझे यह किसी भी तरह से गलत नहीं लगता।


संतोष सुपेकर - आज के पाठक के पास समय नहीं है इसलिए वह लघुकथा पढ़ता है "इस तर्क से आप कहाँ तक सहमत हैं?

कान्ता रॉय  - आज के पाठक के पास समय नहीं है इसलिए वह लघुकथा पढ़ता है इस तर्क से मैं बिल्कुल सहमत नहीं हूँ| आज के पाठक व्यस्तता के अभ्यस्त हैं| वे अपने व्यस्ततम जीवन में भी अपनी अभिरुचियों को पोषित कर लिया करते हैं चाहे वह बाहर सैर-सपाटा हो या तीन घंटे की मूवी देखना| सप्ताहांत में होटलों में खाना खाने के लिए, माल जैसी समय खपाऊ जगहों पर सभ्रांत परिवारों, युवा, युवतियों की भीड़ देखी जा सकती है| प्रतिवर्ष दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाली विश्व पुस्तक मेले की भीड़ देख कर अंदाजा हो जाएगा कि कितने फुर्सत निकाल लिया करते हैं अपनी अभिरुचियों के लिए पाठक वर्ग| पाठक को तलब लगेगी तब वह अपनी रूचि के अनुसार साहित्य की तलाश करेगा| उसको जब लघुकथा पढ़ना होगा तो वह ढूंढ-ढूंढ कर लघुकथा ही पढ़ेगा और जब उसको कहानी पढ़ने का मन होगा तो वह कहीं से भी तलाश के वह सिर्फ कहानी ही पढ़ेगा| यह तो तलब की चीज है चाहे वह उपन्यास भी हो| चेतन भगत आज ही के समय के उपन्यासकार हैं जो युवाओं में अपनी खास जगह बनाने के लिए मशहूर हैं| इस कारण इन बातों की चिंता हमें छोड़ देनी चाहिए| पाठक लघुकथा भी पढ़ता है और कहानी, उपन्यास भी| तो कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि पाठकों के पास हमेशा से समय रहा है पहले भी समय रहा है और आने वाले समय में भी उसके पास समय होगा| फिलहाल उसकी रूचि लघुकथा में है, उसके कहन के ढंग से वह प्रभावित हो रहा है| टू द पॉइंट बात करने वाली जेनेरेशन आज कल अधिक विवरण में नहीं जाना चाहती है सो यह समय लघुकथा का है| लघुकथाकार इसे गंभीरतापूर्वक अपने लेखन में उतारें| 


संतोष सुपेकर- लघुकथा समीक्षा प्रकाशन में समीक्षकों से आप और क्या अपेक्षा करती  हैं? क्या कोई महत्वपूर्ण तथ्य अक्सर समीक्षकों से छूट जाता है? या कुछ अनावश्यक कथन समीक्षा में स्थान घेरते हैं?

कान्ता रॉय  - यह प्रश्न आपने बहुत अच्छा उठाया है| लघुकथा समीक्षा प्रकाशन में समीक्षकों से मेरी कई अपेक्षाएं हैं| अभी जो समीक्षाएं प्रकाशन में आ रही हैं वे सब एक ढर्रे पर बंधी चल रही हैं| न दायें देखना न बाएं, नाक के सीध में एक लकीर खीच दी गयी हैं जिनका अनुसरण करते हुए चलना है| सबकी सब उबाऊ और बासी प्रस्तुतियाँ| जरा सा व्यक्तित्व परिचय, कुछ पंक्तियाँ विधा के सन्दर्भ के इर्दगिर्द और बाकी रचनाओं पर कहते-सुनते, रचनात्मकता कहीं दिखाई नहीं पड़ती और गुणवत्ता तो ईश्वर ही मालिक है! सामान्य पाठकीय प्रतिक्रियाओं को आलोचना-शास्त्र से जोड़ देने की कुप्रवृत्ति लघुकथा विधा को कितना नुकसान पहुंचा रही है ये शायद लघुकथा के प्रायोजित विद्वानों को भी नहीं मालूम| ऐसे में लघुकथा को सैधांतिक समीक्षा के लिए कब अवसर मिलेगा राम ही जाने| इस अमावश को लेकर जानकारों में एक दबाब तो बना हुआ ही है| समीक्षा में जब तक नए सन्दर्भों और नए तथ्यों की तलाश नहीं होगी लघुकथा का बेड़ा  पार लगना मुश्किल है| बाजारवाद लेखकों और प्रकाशकों पर तो हावी हो ही रहा है, इस संक्रमण के दौर में समीक्षकों / विचारकों / चिंतकों से ही अपेक्षा रखना कैसे मुनासिब होगा| हिन्दी साहित्य के विद्वानों, आलोचकों से शास्त्र सम्मत लघुकथा की व्याख्या करते हुए विश्वविद्यालय के स्तर पर पढ़ाये जाने वाले पुस्तकों की दरकार है| आशा है कि ये अँधेरा भी एक दिन अवश्य उजाला लेकर आएगा|

संतोष सुपेकर-  आपकी पत्र-पत्रिकाओं के अनुक्रम में तो लघुकथाकार के नाम के साथ रचना का शीर्षक भी  दिया जाता है जो कि अत्यावश्यक है पर कुछ पत्रिकाओं में लघुकथा ही अनुक्रम में स्थान नही पाती।कहीं -कहीं अनुक्रम मंे केवल लघुकथाकर/लेखक का नाम ही होता है। लघुकथा को अभी भी किसी अन्य स्तम्भ /शीर्षक के अंतर्गत छापा जाता है। आप क्या कहेंगी?

कान्ता रॉय  - आपका अनुक्रम को लेकर जो सवाल है वह सभी सवालों में सबसे जटिल सवाल है। यह सच है कि रचना रचनाकार से बड़ी होती है| रचना ही सर्वोपरि है| सिर्फ रचना के शीर्षक से अनुक्रम बनाना मुश्किल है| एक संपादक होने के नाते यह कह सकती हूँ कारण कई लेखक एक ही शीर्षक से रचनाएँ लिखा करते हैं| एक ही जैसे शीर्षक अनुक्रम में होने से पाठक कैसे अंदाजा लगाएगा कि किस लेखक की कौन सी रचना है? रचना की व्यक्तिगत पहचान में लेखक का नाम होना अति आवश्यक है| आजकल तो कई पुस्तकों के नाम भी एक जैसे पढने में आ रहें हैं| तो बहुत जरूरी है कि लघुकथा के साथ लेखक का नाम भी दें| अनुक्रम का सही प्रारूप रचना का नाम पहले और उसके बाद कॉलम (:) लगाकर लेखक का नाम होना चाहिए| लेकिन सिर्फ लेखक के नाम का होना गलत है, ऐसी परंपराओं को बढ़ावा नहीं देना चाहिए| आप ‘उर्वशी’, ‘दृष्टि’, ‘साहित्य कलश’ के लघुकथा विशेषांक का अनुक्रम देख लीजिये जिसकी मैं अतिथि संपादक भी रही हूँ, आपको पहले रचनाकार का नाम और उसके बाद रचनाएं दी गयीं हैं| लेकिन कई बार ऐसा होता है कि एक ही रचनाकार के हमें तीन चार रचनाएं लेनी होती है जैसे कि ‘समय की दस्तक’ में हुआ था, वहाँ हमारी मजबूरी थी पाँच सौ बहत्तर पृष्ठों में एक सौ बाईस लघुकथाकारों की करीब पाँच सौ लघुकथाएँ शामिल की गयीं थी, अगर रचनाओं का अनुक्रम बनते तो करीब पचास से अधिक पन्ने अनुक्रम में लगाने पड़ते| तो कहने का आशय यह है कि कभी-कभी ऐसी मजबूरी आ जाती हैं कि हमें लेखक का नाम लिखना पड़ता है लेकिन इसके पीछे तकनीकी दिक्कतें हैं न कि लेखकों से उसका रचना से अधिक महत्व देना| आपने एक और प्रश्न किया है कि कुछ पत्रिकाओं में लघुकथा अनुक्रम में स्थान नहीं पाती हैं| यह बहुत दुखद और छोटी सोच है| यह दरअसल गैर जिम्मेदाराना रवैया है जो बहुत ही कम पत्र-पत्रिकाओं में देखने को मिलता है| अधिकतर रचना के साथ लेखक का नाम जरूर लगाते हैं| अन्य स्तंभ \ शीर्षक के अंतर्गत आपने जो बात पूछी है वह सत्य है| कई बार मैंने देखा है, इनका विरोध भी होना चाहिए| एक विरोध प्रकट करने की भी एक सीमा है| लेकिन जरूरी है कि हम लेखक हैं जो संपादन के क्षेत्र में हैं, कम से कम वह इस गलती को ना दोहराएं| सचेत रहने से धीरे-धीरे आगे अन्य संपादकों में भी यह संदेश जाएगा| हमारे संपर्क में जो लोग आएंगे उनकी दृष्टि  भी साफ होगी| जो हमारे स्पष्ट सोच से जुड़ेंगे और प्रभावित होंगे वे इसे अपने माध्यम से आगे बढाएँगे| 

 संतोष सुपेकर - आज लघुकथाओं में आदर्शवाद समाप्त सा हो गया है सब यथार्थ का वर्णन चाहते हैं।हालाँकि आज का यथार्थ बहुत कड़वा है तो क्या लघुकथाकार को इस धारा में बहते हुए ईमानदारी, सच्चाई, धार्मिकता,

नैतिकता जैसे तथ्यों पर आधारित लघुकथा लिखना बिल्कुल छोड़ देना चाहिए?


कान्ता रॉय  - आज लघुकथाओं में आदर्शवाद समाप्त हो गया है ऐसा नहीं कह सकते| इस दिशा में लघुकथाएँ खूब लिखी जा रही है| अच्छे भविष्य की संकल्पना लघुकथा का दायित्व भी है। नैतिकता जैसे तथ्यों को लेकर चलना ही साहित्य का उद्देश्य है। चाहें हम जिस राह चले, अच्छा समाज बनाने के लिए प्रेरित करना ही साहित्य का लक्ष्य है।


संतोष सुपेकर - कई बार लघुकथाकार किन्ही अच्छे-बुरे हालात / विभीषिका की कल्पना कर कोई लघुकथा रच देता है जिसे व्यवहारिक तौर पर खारिज सा कर दिया जाता है यह कहकर कि ऐसा होता नही है।

ऐसी स्थिति में लघुकथाकार क्या करे कि उसकी कल्पना सशक्त रूप में सामने आए और ऐसी लघुकथा जिसका मोह वह छोड़ना नही चाहता, स्वीकृत हो ?

कान्ता रॉय  - ऐसा बिल्कुल भी नहीं है जब रचनाकार रचना को अच्छे बुरे हालात/विभिषिका में उलझा कर सद् साहित्य से दूर लेकर चला जाता है तभी वह व्यवहारिक तौर पर खारिज होने जैसी स्थिति में फंस जाता है। देखिये, भारतीयों में जीवन संस्कार का बड़ा महत्त्व है| हमारे देश की संस्कृति में माता-पिता, भाई-बहन, गुरु-शिक्षक के प्रति आदर का भाव, ममता, वात्सल्य इत्यादि निहित है जो जीवन शैली है| ऐसे में कहीं कोई अवसाद ग्रस्त मानसिकता देखने, सुनने में आ जाता है तो उसको जीवन के यथार्थ के नाम पर परोसने की कोशिश की जाती है| लघुकथा में विकृतियों को इस प्रकार से बढ़ा-चढ़ा कर लिख दिया जाता है मानों दुनिया में कहीं कोई अच्छी बात रह ही नहीं गया, पूरी की पूरी दुनिया व्याभिचारी हो गई है, जीवन मूल्य जैसी बातें अब यहां नहीं बचा है। अब ऐसी रचनाएँ पढ़ कर पाठक जब अपने अन्दर के संस्कार से तुलना करता है तो ख़ारिज कर देता है| जो लेखक इन हालातों को लिखते हैं वे पहले अपने परिवार और आस पड़ोस का आकलन करे कि ऐसी कितनी घटनाएँ रोज घटती हैं| जीवन का यथार्थ हमारे अंदर के संस्कार हैं वह नहीं जो परिस्थितिवश कहीं घटा होगा| लघुकथा में निर्मित परिस्थितियों के कारणों को टटोलना चाहिए न कि छदम परिवेश| जीवन मूल्यों से रहित रचनाओं से साहित्य नहीं रचा जा सकता है| पाठक अच्छे भविष्य के प्रति आशान्वित होना चाहता हैं, वह बुराई पर अच्छाई की जीत देखना चाहता है| अंतिम बात के तौर पर यही कहूँगी कि लेखक को मनोविश्लेषक की भूमिका निभाते हुए अपने समाज की नब्ज टटोलने के पश्चात् ही कलम का उपक्रम करना चाहिए|


Kanta Roy

54/A, Banjari, C-Sector,  

Kolar Road

Bhopal - 462042

Mo. 9575465147

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संतोष सुपेकर

31, सुदामा नगर,

 उज्जैन-456001 (म.प्र.)

मो. 9424816096

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