कृष्ण मनु  

लघुकथा के क्षेत्र में वर्षों से अपना योगदान देने वाले कृष्ण मनु की लघुकथा में जीवन का यथार्थ बोध किस तरह निहित होता है, आप सब भी पढ़ें|---कांता रॉय 


सहमा सुख


                                कृष्ण मनु    


                      


कमरे में प्रवेश करते ही उन्होंने सरसरी निगाहों से चारो तरफ देखा। कोने में रखे रंगीन टीवी पर निगाह पड़ते ही खुशी की झुरझुरी सी उनके शरीर में उठ आयी-'आह! कितनी मशक्कत से खर्च में कतरब्योंत कर मैंने यह टीवी खरीदी थी। प्लास्टिक की चार कुर्सियों की जगह सेकेण्ड हैंड शोफा लगवा पाया था।' उन्होंने सोचा।
उनके लिए नये वर्ष की शुरुआत भी बड़ी अच्छी हुई थी। डूबा पैसा वापस मिला था। आज एक गिफ्ट भी उनके नाम से निकल आया था। हालांकि यह उनके लिए अप्रत्याशित घटना थी क्यांेकि आजतक उन्हें एक धेला तक कहींे से नहीं मिला था।
- जीवन के ये छोटे छोटे सुख ही तो हम जैसे लोगों के हृदय को गतिशील रखे हुये हैं वरना.... । सुख के इस पल को पकड़ते हुए उन्होंने पत्नी को आवाज दी।
- आती हूं। आ गए आप? चाय के लिए पानी चढा़ रही हूं।
-'चाय बनती रहेगी,पहले आओ तो सही। एक खुशखबरी है।
पत्नी हाथ पोंछती हुई आयी-'हां कहिये।'
पत्नी के चेहरे पर उदासीनता देख उन्होंने स्नेहसिक्त हो कहा-'आओ बैठो। अरे हम थोड़ी देर के लिए खुश नहीें हो सकते क्या?
- हां हां क्यों नहीं,जब घर फूंक कर तमाशा देखा जा सकता है तो हम खुश क्यों नहीं हो सकते? जानते भी हैं आप कि चीनी कितनी महंगी हो गई,चीजों के दाम कहां उठ गए?
पत्नी के बेरूखे व्यवहार से उन्हें थोड़ा दुख हुआ-'तुम बैठो तो.......।'
- बैठती हूं,पहले चाय ले आऊं।
पत्नी चाय के साथ एक लिफाफा भी लेते आयी। चाय की चुस्की के साथ वे लिफाफा खोलने लगे। पत्नी बोली-'बेटा का पत्र आया है। कोचिंग लेना चाहता है। बीस हजार तत्काल चाहिए। ड्राफ्ट बनवाकर भिजवा दीजिये।'
- बबबीस हजार! उनके मुंह से चीख निकल गई मानो बीस हजार बिच्छु एक साथ डंक मार दिये हों। बिना एक शब्द आगे बोले वे चाय की चुस्की लेते रहे जैसे घूंट घूंट कर गम पी रहे हों। बेचारा सहमा सा सुख दूर खड़ा था।Û


                             



                          अनुरोध से आदेश तक


                                        कृष्ण मनु


उसने घड़ी देखी। आफिस बंद हो चुका था। सारे स्टाफ जा चुके थे। वह भी उठने ही वाला था कि.....बाॅस का काॅल.......पिउन बुलाकर जा चुका था।
आखिर बात क्या हो सकती है? आफिस बंद होने पर कभी बाॅस ने बुलाया नहीं। वैसे भी उसका कार्य निष्पादन इतना परफेक्ट होता है कि बाॅस को बुलाने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
सोचते सोचते वह बाॅस के सामने था।
-'परेश जी, आप को एक कष्ट दे रहा हूं। संकोंच हो रहा है....क्या कहूं? आज मेरा ड्राइवर नहीं है.....और यह बुजुर्ग पिउन.....ठीक से चल भी नहीं पाता। मेरे लिए ...दो सिगरेट ले आइये प्लीज.....यहीं, बाजार से।'
परेश को बुरा लगा फिर भी बाॅस का अनुरोध वह टाल नहीं सका।
-'कोई बात नहीं सर। मैं अभी ला देता हूं।'
सिगरेट लेकर बाॅस 'थैंक यू' का जैसे माला जपने लगा।


दो दिनों बाद.......फिर वही समय.....बाॅस का वही काॅल।
अन्यमनस्क भाव के साथ परेश केबिन में दाखिल हुआ। इस बार बाॅस का भाव भंगिमा में अंतर था।
-'परेश जी, यह लीजिये पैसे, मेरे लिए दो सिगरेट ले आइये।'
सिगरेट होठों में दबाकर पता नहीं बाॅस ने क्या कहा....परेश को लगा बाॅस ने 'थैंक यू' कहा है।


दूसरे दिन फिर वही समय......वही काॅल.....
-'दो सिगरेट लाना....जरा जल्दी...मिटिंग में जाना है।'
यह बाॅस का आदेश था। आदेशात्मक लहजे ने परेश के तापमान को जैसे उफान पर ले आया लेकिन अगले ही क्षण वह ठण्ढा हो गया। बीवी बच्चों का चेहरा सामने आ गया था। Û
                                                                                                                     


 


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