लघुकथा आज : कान्ता रॉय

लघुकथा का आज- कान्ता रॉय

8/1/2020 : दिल्ली : पुस्तक मेला

 

कहानीकारों ने की कहानी के गर्भ में लघुकथा की स्थापना

 

सच तो यही है कि ‘लघुकथा आज’ अपने ‘कल’ के ही दम पर खड़ी है| लघुकथा की अस्तित्व की यात्रा तो कहानी के साथ ही शुरू हो चुकी थी। वह अन्तरधारा के समान कहानी के साथ-साथ बह रही थी। हिंदी कहानी की यात्रा का शुभारम्भ लघुकथा की अंगुली थाम कर ही हुआ| माधवराव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ लघुकथा को कहानी विधा में छोटी यानि लघु कहानी के रूप में चिन्हित किया गया| लम्बी कहानियों के बीच अपनी सुगबुगाहट को ‘झलमला’ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, ‘विमाता’ छबिलेलाल गोस्वामी, ‘बिल्ली और बुखार’ माखनलाल चतुर्वेदी, ‘गुदड़ साईं’ जयशंकर प्रसाद, ‘जंगल और कुल्हारी’ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, ‘जाति’ हरिशंकर परसाई, ‘मैं वही भगीरथ हूँ’ शरद जोशी सहित उपेन्द्रनाथ अश्क, रामवृक्ष बेनीपुरी की ‘पनिहारिन’ जैसी अनेकों लघुकथाएँ अपने कलेवर के आकर्षण में सम्मोहित रचनाकारों, उन दिनों जो समकालीन रहे हैं उनके द्वारा रच दी गयी थी। इसी के कारण कालांतर में लघुता के साथ पूरे दमोखम से लघुकथा अपनी प्रभुता बनाने में सफल हुई| इस तरह हम कह सकते है कि वह समय जितना कहानी का था उतना ही लघुकथा का भी था| फर्क बस इतना था कि लघुकथा को कहानी के विशेषण के रूप में रेखांकित किया गया था। लेकिन सत्तर तक आते-आते लघुकथा कहानी का दामन छोड़ वह संज्ञा के रूप में उन दशकों में समकालीन कथाकारों द्वारा प्रतिस्थापित हुई| सिद्धहस्त साहित्यकारों ने इसे पोषित किया। वह समय हरिशंकर परसाई समेत शरद जोशी, विष्णु प्रभाकर रामनारायण उपाध्याय, रावी जैसे रचनाकारों का समय था, जिन्होंने लघुकथा को मजबूती प्रदान की। ये लेखक नए प्रयोग के साथ जहाँ एक तरफ नई विधा को अंगीकार कर रहे थे वहीं दूसरी तरफ रूढ़िवादी रचनाकार इसे नकारने पर लगे थे।

खैर, सत्तर तक आते-आते लघुकथा स्थापित हो ही चुकी थी| दिन प्रतिदिन इसके प्रति लेखकों का रुझान बढ़ा और शनैः शनैः लघुकथा ने आंदोलन का रूप ले लिया| सन 2020 तक आते आते अस्तित्व के लिए संघर्ष का समय समाप्त हो चुका है। अब वह अपने स्वर्णिम काल में है|

कहानी के उस दौर में लघुकथा ने अपनी जगह कैसे बनाई?

दरअसल लघुकथा भारतीय दर्शन के निकट की चीज है। भारतीय ज्ञान परम्परा में वेदों, उपनिषदों में प्राचीन लघुकथा निहित है। लोककथा के रूप में भारतीय जन मानस में लघुकथा चिर काल से ही स्थापित है। संस्कृत, पाली, अपभ्रंश, ब्रज, अवधी, मैथिली की लोककथा का बदला हुआ स्वरूप आज की ‘लघुकथा’ है। अर्थात हिन्दी लघुकथा की इमारत में पंचतंत्र, हितोपदेश, कथा सरित्सागर, बोध कथाएं, लोककथाएं, व्रत त्यौहार में कही-सुनाई जाने वाली धार्मिक कथाओं की नींव है जो मजबूत ही नहीं बल्कि सुगठित सुरचित भी है। अब जिस इमारत की नींव इतनी मजबूत होगी उस इमारत को तो बुलंदियां छूना ही था, सो छू रही है|

प्राचीन कालखंड से गुजरती हुई प्राचीन लघुकथा भारतेंदु युग आते-आते खड़ी बोली में प्रवेश करती है। और यहीं से शुरू होती है कहानी की यात्रा। प्रेरक प्रसंगों तथा बोधकथाओं से प्रेरित कथाएं जब अपना विस्तार करने लगी तो तेवर और कलेवर में बदलाव दृष्टिगोचर हुआ।

आधुनिक युग के साहित्य और प्राचीन साहित्य में सबसे बड़ा फर्क यही था कि प्राचीन साहित्य अपने पात्रों की विभिन्न वृत्तियों को आदर्शवादी दिखाने का प्रयास करता है। पाठक कथाओं में प्रस्तुत पात्रों को ईश्वर या ईश्वर तुल्य होने का दर्जा देते हैं। सामंतवादी सोच का दूषित परिणाम स्वरुप कृत्रिम भावनाओं को प्रकट करना ही मात्र उद्देश्य था| शायद यही कारण था कि प्राचीन साहित्य की अति आदर्शवादिता जन-मानस के मन में वो स्थान नहीं बना पाई जो स्थान लघुकथा बना रही है।

सर्वप्रथम कविता में संत साहित्य ने ही जन मानस से सम्बंधित समस्याओं को प्रमुखता से स्थान दिया था। उससे पहले दरबारी कवि हुआ करते थे जो अपने-अपने राजाओं के शासनतंत्र एवं उनके जीवन के सुनहरे पक्ष का बखान करने के लिए पोषित लिए जाते थे।

संत साहित्य के बाद भरतेंदु युग में एक बड़ा परिवर्तन गद्य में देखने को मिलता है। कथा साहित्य में भारतेंदु हरिशचंद ने जो लम्बी रेख खींची वह आज एक सौ चालिस साल बाद भी प्रासंगिक है।

सन 1901 में ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ का प्रकाशन प्रकाश में आया। यहां से कहानी की शुरूआत मानी जाती है ओर लघुकथा की भी। ‘एक टोकरी मिट्टी’ कहानी के रूप में रेखांकित हुई थी, कारण उस वक्त ‘लघुकथा’ अस्तित्व में नहीं था और जो अस्तित्व में था, छोटा रूप माना जा रहा था वह लघु-कथा थी। उस वक्त जितनी भी लघुकथाएं लिखी गई अधिकतर कहानी या छोटी कहानी के रूप में दर्ज हुई।

कहते हैं न कि वर्तमान के गर्भ में भविष्य छुपा होता है। दरअसल कहानीकारों ने ही कहानी के गर्भ में लघुकथा की स्थापना अनायास ही कर दी थी। जिसमें प्रेमचंद्र, जयशंकर, प्रसाद, कन्हैयालाल मिश्र, छबीलेलाल गोस्वामी, माखनलाल चतुर्वेंदी, अयोध्याप्रसाद गोयलीय, उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ सहित अनेकों नाम दर्ज हैं, जिनके द्वारा कहानी के प्रयास में लघुकथा लिख ली गई थीं। इस तरह से कहानी के दौर में ‘लघुकथा’ लघु-कथा के रूप में विकसित होती रही।

खलील जिब्रान, मंटो अपनी लघुकथाओं के माध्यम से खूब चर्चित हो रहे थे। उन दिनों भी पाठकों द्वारा यह खूब पढ़ी जाने लगी थी। प्रेमचंद्र के बाद जब अपनी अगली पीढ़ी हरिशंकर परसाई और विष्णु प्रभाकर का युग आया तो रामनारायण उपाध्याय, रावी सहित अनेक गद्यकारों ने कलात्मकता लिए इस लघुरूप को बेहद पसंद किया| दरअसल लघुकथा के लिए ‘सत्तर’ के पूर्व सायास प्रयास नहीं हुआ। वह स्वतः ही अपने आकर्षक कलेवर के कारण लेखक और पाठक खींच लाई।

सन् 1970 तक आते-आते लघुकथा पूर्व यौवन पर थी, वह प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी थी। अब बारी थी ‘लघुकथा’ को विधा के रूप में स्थापित करने की| इसके लिए संघर्ष शुरू हुआ जो अब तक जारी है।

इस आंदोलन की साक्षी रही पत्र-पत्रिकाओं में सारिका, तारिका (अब शुभतारिका), आघात, मिनी युग, जनगाथा, क्षितिज, दृष्टि सहित अनेकों नाम हैं। इन पत्र-पत्रिकाओं ने आंदोलन को सफल बनाने के प्रयास में भागीदारी भी की।

उस लम्बे अन्तराल में जिए हुए संघर्षों की बदौलत ही ‘लघुकथा आज’ अपने स्वर्णिम काल को जा रही है| स्कूल, कालेजों के पाठ्यक्रम में लघुकथाएं पढ़ाई जा रही है, जो सुखद है| इन सब उपलब्धियों का श्रेय उस दौर के लघुकथाकारों को ही जाता है| इतना सब होने के बाद भी ‘लघुकथा आज’ को खुशफहमी नहीं पालना चाहिए क्योंकि अभी इसके माथे सेहरा नहीं बंधा है कारण अकादमिक स्तर पर अभी भी काम न के बराबर ही हुआ है| जहां तक मुझे नजर आता है कि हरियाणा ग्रंथ अकादमी द्वारा पुस्तक प्रकाशन ‘समकालीन लघुकथा’ अशोक भाटिया एवं पंजाब साहित्य अकादमी द्वारा ‘मिन्नी कहानी’ अर्थात लघुकथा को प्रश्रय मिला है। निश्चित तौर पर यह उपलब्धि अशोक भाटिया एवं श्यामसुंदर अग्रवाल की मेहनत के बदौलत है। यहाँ कमलेश भारतीय जी के अवदान को रेखांकित करना जरूरी है।

कथाकार बलराम यूजीसी से अप्रुव पुस्तकें कालेज के पाठ्यक्रम में लगवा कर एक महत्वपूर्ण कदम उठा चुके हैं। बलराम जी का काम पनडुब्बी वाहक के समान है जो समुद्र के तलहटी में मीलों की दूरी तय कर अब तक बाहर निकल आते है।

पूर्व में बलराम की ‘बीसवीं सदी की लघुकथाएं’ चार खण्डों में किताबघर से प्रकाशित हुई है| नब्बे के दशक में विश्व लघुकथा कोश के कई खंड निकाल चुके थे। एक तरफ जहां सोशल मीडिया एवं सम्मेलनों में लघुकथा पर हो रहे कार्यों के प्रति चिंता खुले रूप से जाहिर की जा रही थी, वहीं वे चुप्पी साधे हुए थे। लोगों ने तो यह भी मान लिया था कि वे लघुकथा के अब नहीं रह गए हैं। लेकिन पनडुब्बी वाहक के समान अपने छह खंडों के साथ ‘राजकमल’ जैसे बड़े प्रकाशन के सहयोग से पाठ्यक्रम की किताबें लेकर आते हैं जो यूपीसी द्वारा अप्रूव है। स्नातक के पाठ्यक्रम में लगाई जाने वाली ये पुस्तकें निश्चित ही लघुकथा को वास्तविकता तौर पर स्वर्णिम काल में लेकर आती है।

अब आती हूं सोशल मीडिया का लघुकथा में अवदान पर।

सोशल मीडिया ने लघुकथा के फलक को विस्तार दिया है। वास्तव में नए लेखकों की एक बड़ी फौज तैयार हुई है। इसके बावजूद इसमें जरा भी दो राय नहीं है कि सृजनात्मक लेखन की यहां अब भी कमी बनी हुई है। लिखने वालों में चौथाई भर लेखक ही उस स्तर को छू पा रहे हैं जिस स्तर के लेखन की लघुकथा को जरूरत है| लेखकों की बढ़ोत्तरी के साथ ही सोशल मीडिया ने लघुकथा को बाजार में लाकर खड़ा कर दिया है। लेखक का दायित्व बोध बाजार की बिकाऊ पॉलिसी में भ्रमित अवस्था में है।

‘‘अपनी किताब बेचना है, मुनाफा कमाना है।" येन-केन-प्रकारेण सब तरह से वे इसे आजमा रहे हैं| खुद को जितवाने की प्रवृत्ति, स्वयं में लिप्सा बढ़ गई है। ‘प्रतिलिपि’ और ‘स्टोरी मिरर’ जैसी बेवसाइटों ने लिंक शेयर करने में इजाफा के चक्कर में व्यूअर्स की संख्या बढ़ाने के खेल में लेखकों को उलझा रखा है| आए दिन साथी लेखक अपने लिए वोट मांगते नजर आते हैं। मैसेंजर में उनके द्वारा किए गए निवेदन तकलीफ देते हैं| लेखकों में इस तरह की सोच पैदा करना विसंगतिपूर्ण है। जिनकी पुस्तकें नहीं बिकती, वे कुंठाग्रस्त हो रहें हैं।

कुछ कथित वरिष्ठ ऐसे भी हैं जिन्हें लघुकथा के हित और नव लेखकों के लेखन उनकी सृजनात्मकता से दूर-दूर तक का लेना देना नहीं है। क्योंकि देखा गया कि लेखकों में से अगर किसी ने उनसे रचना पर सलाह या मशविरा करना चाहा तो वे अपनी पुस्तक का बंडल चस्पा कर देते हैं कि इन्हें पढ़िए खुद ही सीख जाएंगे। दरअसल इन्हें सीखने सीखाने से दूर दूर तक का मतलब नहीं रहता| ऐसे लोग नव लेखकों में सिर्फ अपना बाजार तलाशते नजर आते हैं।

लघुकथा के ‘आज’ को यह कहना चाहती हूं कि खुद को बाजारू होने से बचाएं रखें। क्योंकि समय स्वर्णकाल के साथ-ही संक्रमण काल का भी है। तरह-तरह के प्रलोभनों से बाजार सजा हुआ है। हम बिकाऊ न बने।

नई पीढ़ी अध्ययनशील नहीं है - मैं इस बात को सिरे से खारिज करती हूँ, क्योंकि अगर नई पीढ़ी अध्ययनशील नहीं होती तो उनका ध्यान लेखन की तरफ नहीं होता। लेखक होने से पहले नई पीढ़ी पाठक थे। पाठक के रूप में उन्होंने रचनाएं पढ़ी। उनके दिल पर असर हुआ तभी वे चिंतन को प्रवृत्त हुए हैं। पढ़ने के दौरान उन्हें जब एहसास हुआ कि उनका भोगा हुआ यथार्थ पढ़ी गई सामग्री से अलग है तब उनके मन में हलचल पैदा हुई और वे अपना भोगा हुआ यथार्थ चित्रित करने हेतु लेखन की ओर अग्रसर हुए। नव लेखकों में मेरे सह लेखक साथी भी हैं। मैंने पाया है कि वक्त लगता है लघुकथा को साधने में, लेकिन निरंतर प्रयास करते हुए साल-छह महीने में वे रफ्तार पकड़ लेते है। इसका उदाहरण आप पूनम डोगरा, चंद्रेश छतलानी, सुधीर द्विवेदी, सुनील वर्मा, पवन जैन, कपिल शास्त्री, मधु जैन, मुजफ्फर इकबाल सिद्दीकी, रंजना वर्मा, सुनीता प्रकाश, उपमा शर्मा, जया आर्य, नीरज शर्मा, संध्या तिवारी सहित डेढ़ सौ से अधिक उदाहरण सामने हैं जो वर्तमान में लघुकथा कलश, मिन्नी कहानी, दृष्टि, क्षितिज, अविराम साहित्य, लघुकथा वृत्त जैसी पत्र-पत्रिकाओं एवं लघुकथा संकलनों, पुस्तकों में निरंतरता से प्रकाशित हो रहे हैं। कई लघुकथा संकलन नव लेखकों को केन्द्र में रखकर तैयार किये जा रहें हैं| उन्हीं संपादकों में से एक ने बड़प्पन जताते हुए कहा कि हमने जो संकलन छापा है उनमें एक भी लघुकथा नहीं है, या पच्चीस प्रतिशत ही लघुकथा है। अब सवाल यह है कि ऐसी भी क्या मजबूरी थी कि ऐसे लघुकथा संकलन को प्रकाशित करने की, जिसके सम्पादन के उपरांत, पुस्तक प्रकाशित करने के बाद आप इस तरह से अपने द्वारा चुने गए लेखकों पर कटाक्ष करें, ताना सुनाएं। अब सवाल यह उठता है कि जब वे रचनाएं लघुकथा नहीं थी तो क्यों पुस्तक का हिस्सा बनी? आपकी कौन सी मजबूरी थी कि ऐसी पुस्तक प्रकाशित करनी पड़ी? दरअसल यहां नवलेखकों में अपना बाजार खोजने का लालच हावी था। लेखक जब प्रकाशक बना तो वह बिक गया। बिके हुए लोग विश्वास के काबिल नहीं होते हैं।

नए लेखकों को यह बात गांठ बांधकर रख लेना होगा कि कोई भी पुरोधा आपको नहीं बना सकता। साप्रयास अगर कुछ मिल भी जाए तो उसकी उम्र क्षणिक होगी। याद रखें कि आपको आगे आपकी रचनाएं ही ले जाएंगी। मैं एक बार फिर से कहना चाहूंगी कि लघुकथा का प्राचीनतम इतिहास समृद्धि से भरपूर है|

लघुकथा का कल आज के होने का कारण है और आने वाले भविष्य में इस स्वर्णिम काल को बने रहने हेतु मिलजुल कर अकादमिक स्तर पर मेहनत करना होगा। क्योंकि जब तक अकादमिक स्तर पर लघुकथा के लिए काम नहीं किया जाएगा, हम मंजिल से दूर ही रहेंगे|

roy.kanta69@gmail.com

मो. 9575465147

 

                     

 

 

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