लघुकथा को हमें आकाश-कुसुम नहीं बनाना है


                                                 
                                
 लघुकथा को हमें आकाश-कुसुम नहीं बनाना है
                                                     कान्ता रॉय 
 
जैसा कि हम सब जानते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है, और कोई भी नया काम यूँ ही शुरू नहीं होता| इसके पीछे एक लम्बी दास्तान होती है| किसी भी कार्य को करते हुए उसके पीछे कंटक-से उगते नित नयी परेशानियाँ, चिंताएँ और मुश्किलों से उबरने के लिए नित नए साधनों की तलाश| इसी तलाश के फलस्वरूप नए साधन, नए दस्तावेज, नई योजनाएँ सृजित होती रही है| जब मैं अपनी पहली लघुकथा संग्रह ‘घाट पर ठहराव कहाँ' के विमोचन हेतु  24वाँ अंतर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन कोटकपूरा, पंजाब गयी तो वहाँ लघुकथा-विधा पर हुए कामों पर वृहत परिवेश को पाया| उन कामों की तुलना मन ही मन भोपाल के साहित्यिक परिवेश से करने लगी, जहाँ प्रायः सभी मंचों पर मैं अकेली लघुकथा-पाठ करते हुए पायी जाती थी| ऐसा नहीं था कि कहानियों, ग़ज़ल, दोहा, छंदों के बीच लघुकथा पर एक मात्र मेरा पाठ करना मुझे विचलित नहीं करता था, लेकिन मैं उस छोटी बच्ची के सामान थी जो अकेली नाव लेकर भोपाल में  साहित्य के समन्दर में उतर गयी थी| ‘लघुकथा के परिंदे’ फेसबुक मंच पर निरंतरता से किए गए आभासी कार्यों को अब जमीनी हकीकत से रूबरू कराना जरूरी लगा। इस सन्दर्भ में मन में कई योजनाएं उमड़ने-घुमड़ने लगी थी। 
लघुकथा में मेरे प्रयासों को संबल देने के लिए जो दो मजबूत हाथ सामने आगे बढ़कर आये वे दोनों हाथ डॉ. मालती बसंत जी के थे| मालती जी से मैंने कहा कि मैं एक लघुकथा का मंच स्थापित करना चाहती हूँ जहाँ प्रत्येक महीने लघुकथा पर गोष्ठी हो ताकि भोपाल में लघुकथा की जमीन तैयार करने में मदद मिले| सुनकर अत्यंत ख़ुशी जाहिर करते हुए पूरा सहयोग करने की उन्होंने सहमती तो दे दी, लेकिन  साथ में ये भी कहा कि “मैं परमार्थ-कार्यों हेतु एक ट्रस्ट की स्थापना करना चाहती हूँ जिसमें बाल साहित्य और लघुकथा भी होगा, उसको भी तुम ही संभालोगी|” सुनते ही मैं विचार में पड़ गयी कि दो अलग-अलग मंचों पर एक साथ, एक ही विधा पर काम कैसे कर पाऊँगी? और तुरंत मैंने लघुकथा मंच बनाने की अपनी समस्त योजना निरस्त कर ‘श्री कृष्णकृपा मालती महावर बसंत परमार्थ न्यास’ के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया| उसके बाद मालती जी के साथ सरकारी दफ्तरों में चक्कर पर चक्कर, कभी ये कागज़-कभी वो कागज़, हम दोनों मिलकर चप्पल घिसने के लिए कमर कस लिए और सालों, काफी मशक्कत बाद, ट्रस्ट को आदेश-पत्र मिला और न्यास के तहत 27 सितम्बर माह 2017 को अखिल भारतीय स्तर पर लघुकथा पर हुए सभी कार्यों को केन्द्रित करने के संकल्प के साथ  शोधात्मक सामग्रियों के संरक्षण-संवर्धन के लिए लघुकथाकार साथियों के उपस्थिति में बड़े उत्साह से, 12/7,अजंता कॉमप्लेक्स, इन्द्रपूरी, जो कि न्यास का कार्यालय एवं पुस्तकालय है, वहाँ मध्यप्रदेश लेखक संघ के अध्यक्ष डॉ. रामवल्लभ आचार्य जी के हाथों ‘लघुकथा शोध केंद्र भोपाल, मध्यप्रदेश’ की स्थापना की गयी| पिछले आठ महीनों में हमने लघुकथा के विभिन्न मापदंडों पर चर्चा-विमर्श करते हुए लघुकथा पाठ पर त्वरित समीक्षा-गोष्ठी, कार्यशाला, व्यंग्यात्मक लघुकथा पर गोष्ठी, पुस्तक-चर्चा, मानवेतर लघुकथाओं का प्रारूप और उसकी प्रस्तुति के महत्व, समीक्षा-गोष्ठी इत्यादि के साथ सीखने-सिखाने पर एक समृद्ध वातावरण तैयार करने की कोशिश की| 
विगत आठ महीनों में कई बार ये देखकर  निराशा हुई कि कई लेखक/ लेखिकाओं में लघुकथा को लेकर बड़ी भ्रामक स्थिति बनी हुई है| वे हिंदी कथा-साहित्य के तीन मुख्य विधा ‘उपन्यास-कहानी-लघुकथा’ में से लघुकथा के गूढ़ लेखन से अनजान हैं| लघुकथा को मात्र लघु कहानी, संस्मरण, आँखों देखी, दुर्घटनाओं को, अपवादों को, बढ़ा-चढ़ा कर, उसी को लघुकथा समझकर लिखते और पढ़ते हैं| 
कथा साहित्य की इस जहीन विधा के शिल्प, जो एक विचार को कथ्य बनाकर कथात्मक प्रस्तुति है, इससे एक बहुत बड़ा वर्ग जिसमें पाठक एवं लेखक दोनों शामिल हैं, दोनों अनजान हैं| 
इस बात ने मन में खलबली मचा दी| लेखन-प्रकाशन-गोष्ठियाँ  एवं सम्मेलनों में व्यस्त मेरा मन अवचेतनता में उस साधन की तलाश में जुटा रहता था| लघुकथा शोध केंद्र का पहला प्रकाशन  ‘परिंदे पूछते हैं’ लघुकथा विमर्श, लेखक-डॉ. अशोक भाटिया, के प्रकाशन दौरान प्रेस काम्प्लेक्स में एक दैनिक अखबार को अपनी सामने छपते देखना| टकटकी लगाकर  उसके बारे में जिज्ञासु होना, उसी वक्त उक्त अखबार की प्रति हाथ में आना, मन को हठात जैसे दिशा मिल गयी थी| अब योजना के  क्रियान्वयन करने की बारी थी| जिन-जिन साथियों के सामने योजना मैंने रखी, सबने अपना हाथ बेझिझक आगे बढ़ा दिया| बात ही बात में मंच की संस्थापिका एवं 'लघुकथा टाइम्स' अब 'लघुकथा वृत्त' (मासिक अखबार) की संरक्षक डॉ. मालती बसंत सहित मेरे अन्य दस सहयोगी, श्री गोकुल सोनी, श्री घनश्याम मैथिल ‘अमृत’, सुश्री जया आर्य, सुश्री सुनीता प्रकाश, सुश्री  महिमा वर्मा श्रीवास्तव, सुश्री शशि बंसल, श्री संजय पठाडे ‘शेष’, सुश्री डॉ. वर्षा चौबे, श्री कपिल शास्त्री, सुश्री भूपिन्द्र कौर, जो लघुकथा शोध केंद्र भोपाल मध्यप्रदेश में लघुकथा के साथी थे वे इस अखबार ‘लघुकथा टाइम्स’ के सम्पादक-मंडल बन गए| शालीमार गार्डेन, भोपाल में आदरणीया जया आर्य जी के घर पर लघुकथा टाइम्स की पहली सम्पादक-मंडल की बैठक हुई| वक्त से सब पहुंचे| अखबार के प्रारूप पर एवं अन्य कई महत्वपूर्ण मुद्दे पर बैठक हुई| बाद में हम सब व्हाट्सएप पर समय-समय पर मीटिंग करते हुए महीने भर में अखबार की समग्र सामग्री तैयार हुई|   
अखबार की महत्ता,पिछले पांच सालों में लघुकथा पर काम करते हुए, विधा पर हुए अब तक के कामों का अध्ययन करते हुए पाया कि जितना काम अब  तक में विधा के लिए हुआ है वो काफी नहीं हैलघुकथाएँ निरंतरता से लिखी तो जा रही थी लेकिन वह पुस्तकों-पत्रिकाओं तक सिमट कर रह गयी थी| पाठकों में लघुकथा को लेकर जागरूकता नहीं है अर्थात साहित्य संपदा बढ़ाने के लिए जितना काम हुआ उस हिसाब से मंचों पर लघुकथा का कार्य न के बराबर था| अब लघुकथा एवं इसकी महत्ता  को जन-सामान्य तक पहुँचाना होगा| हम जिस सामाजिक सरोकार के लिए लिख रहें है बात उन तक पहुँचना जरूरी है
किताबों का मूल्य और उसकी बौद्धिकता ही उसे बुद्धिजीवियों तक सिमटे रहने को बाध्य कर लघुकथा को पाठकों से दूर उसको सीमित दायरे में बाँध रही है| इसलिए हमें एक सस्ता माध्यम अपनाना था, जिसका निर्वाह बेझिझक हर पॉकेट कर सके, जो अति साधारण हो, जिसको सहेज कर रखने की बाध्यता ना हो| अखबार के माध्यम से, अपनी हेड लाइन्स के जरिये  लघुकथा हाकर्स से चौक-चौराहे, घरों के बैठक, बैठक से रद्दी के रैक तक, रैक से गृहणी के रसोई तक, जहाँ खाना बनाते हुए, सब्जी-भाजी की सार-संभाल में एक-आध लघुकथा पर नजर टिकाते हुए,रद्दी वाले को तौलते हुए, चाट-समोसे की पत्तल में पढ़ते हुए-प्रेस वाले की दूकान में, ड्राईक्लीनर के दुकानों में साड़ी-शर्ट-कुर्तियों में जमते-जमाते हुए, हर वर्ग के नजरों से गुजर कर लघुकथा अपना  पाठक बनाए, क्योंकि अखबार की उम्र भले कम हो लेकिन सत्य यही है कि वर्तमान में सबसे अधिक जन-जन तक पहुँचने वाली यह सबसे अधिक पाठन योग्य प्रकाशन हैलघुकथा को हमें अब आकाश-कुसुम नहीं बनाना है, बल्कि हर आँगन में उगने वाली तुलसी बनाना है जो समाज के लिए गुणकारी एवं हितकारी है
लघुकथा टाइम्स, एक मासिक अखबार होगा जो देश-देशांतर में, सभी भाषा में, लघुकथा पर हो रहे कार्यों की विस्तार पूर्वक रिपोर्टिंग करेगा और लघुकथा संदर्भ में विविध सामग्री पाठक वर्ग को उपलब्ध करवाएगा। 
इसका मासिक प्रकाशन होगा| आप सब पाठक एवं लेखकों से निवेदन है कि  अपने-अपने क्षेत्रों में किये गए लघुकथा पर लेखन, प्रकाशन, गोष्ठी, सम्मलेन इत्यादि गतिविधियों की रिपोर्ट बना कर इस पते पर मेल करें या डाक द्वारा प्रेषित करें|
 
 
मकान नम्बर-21
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गोविंदपूरा
भोपाल- 462023
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ई मेल roy.kanta69@gmail.com
 
 
 
 

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