उपन्यास का सार सम्भालती लघुकथाएं

 

उपन्यास का सार सम्भालती लघुकथाएं- कान्ता रॉय 

 


भोपाल का साहित्यिक परिवेश चुपके-चुपके  धीमी गति से एक नवीन यात्रा पर निकल रहा है और यह यात्रा है लघुकथा विधा की ओर एक नवीन यात्रा की। नवीन से मेरा आशय पिछले ढाई दशकों से रूकी हुई यात्रा का पुनरुत्थान से। हिन्दी लघुकथा ने देश ही नहीं बल्कि भौगोलिक परिधि को लांघ विदेशों तक अपने को विस्तृत किया है।

नए लोग, नया समाज और नयी चेतना, हाथ से छूटती संस्कृति और सभ्यता के स्थापना के लिए आज जिंदगी जीने के मूल्यों पर लोगों ने फिर से विरासतों को टटोलना शुरू कर दिया है। भारतेंदु काल से लेकर अब तक लघुकथा ने सवा सौ साल का इतिहास दर्ज कराया है। बोधकथा, नीति कथा, पंचतंत्र, जातक कथाओं व प्रेरणादायी कथाओं ने जहाँ व्यक्ति निर्माण में सहयोग दिया है वहीं व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ रोष व्यक्त करने के उद्देश्य से लघुकथा विधा सृजित हुई थी। सत्तर से लेकर अब तक लघुकथा निरंतरता से विकास की राह पर उन्मुख है। नयी भाषा, नयी सोच और नए-नए प्रयोग लघुकथा विधा को विस्तार देने के लिए अग्रसर है।

चाहे किसी भी युग की बात हो जब भी बदलाव के लिए व्यवस्था के खिलाफ बिगुल बजाया जाता है तो जन मानस तक पहुंच बनाने के लिए माध्यम हमेशा साहित्य ही बनता रहा है। हिन्दी गद्य साहित्य की कथा-साहित्य में प्रमुख रूप से उपन्यास, कहानी और लघुकथा का स्थान है जिसमें लघुकथा ही एक मात्र ऐसी विधा है जो अपनी सृजनात्मक शक्ति से भरपूर है। कथ्य के ईर्द-गिर्द घूमती कथानक का स्वरूप अपने में पूरे उपन्यास का सार सम्भालने की क्षमता रखता है।

घनश्याम मैथिल'अमृत' भोपाल के साहित्यिक परिवेश में एक जाने माने समीक्षक, कवि और लघुकथाकार के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग के एक पाठक मंच को चलाते हैं। साहित्य के प्रायोजन को समझते हुए जब कोई कलम चलती है तो वह सर्वोत्तम प्रयास के तहत नए विचारों को वहन करने के तहत कृति सामने आती है। '....... एक लोहार की' लघुकथा संग्रह घनश्याम मैथिल'अमृत' द्वारा वैचारिक धरातल पर रचित एक सोच है जिसके माध्यम से वे नयी चेतना भरने का प्रयास किया है। आपकी लघुकथाओं के कथ्य में जीवन के मर्म को संदेश बनाने की कोशिश की गई है। चाहे वो 'कागजी घोड़े' हो या 'अपने-अपने झंडे' एक तरफ़ वन संरक्षण के नाम पर तो दूसरी तरफ झंडा मानसिकता, दोनों  लघुकथा में भ्रष्टाचार में लिप्त दो रंगों का समावेश कर इसको मुद्दा बनाकर कटाक्ष रोपित किया गया है। 'जिंदगी की शुरुआत' में सड़क दुघर्टना में घायल के प्रति मानवीय संवेदनाओं को बुनने की कोशिश की गई है जहां शादी के बाद दुल्हन लेकर लौटते वर का आगे बढ़ने और दुर्घटना ग्रस्त की सहायता करने को कथ्य मिला है। यहां मदद माँगने पर पुलिस की गाड़ी का अनदेखा कर आगे बढ़ जाना पाठक मन में प्रशासन के प्रति रोष पैदा होता है। 'अपने में कैद आदमी' आदमी को समाज से अलग थलग  हो जाने को सोशल मिडिया के दुष्परिणाम को कथ्य मिला है। 'कथनी करनी' के माध्यम से साइंस सेंटर में नींबू मिर्ची टाँगने की दोहरी सोच को कथ्य मिला है। 'अपना और पराया दर्द' दलित विमर्श के तहत लिखी गई लघुकथा है जिसमें वर्गभेद को लेकर कथ्य बुना गया है। 'आराधना अपनी- अपनी','एक इलाज यह भी' और 'विकलांग कौन...?' यहां तीन तरह के विचार पक्ष को लेकर कथा लिखी गई है जिसमें एक तरफ युवाओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए चंदा उसूली के माध्यम से गरीब बच्चों में खर्च करने पर केन्द्रित है तो दूसरे में सरकारी दफ्तरों में थूकने, यहां वहां मूत्र त्याग करने की मानसिकता को दर्शाता है तो वहीं विकलांगता पर हौसले की विजय परवान चढ़ती है।

'स्पॉन्सरसिप' बड़ी चीज़ होती है। आखिर खर्च के लिए पैसा भी जरूरी है चाहे वो किसी भी कंडिशन में प्राप्त हो।

'कंधों पर अंतिम यात्रा' दादा की अंतिम चाहत पर युवा पोते की सोच समाज को दुविधा में डाल जाती है कि यह कैसी उच्च शिक्षा हासिल कर रहें हैं। 'सच्चा शिल्पकार कौन', पागल कौन, अँगूठा टेक आदमी, सीता रेखा, भाग्यशाली माँ बाप, हमें भी जीने दो सहित अन्य लघुकथाएं जीवन में सम्बन्धों के ताने बाने में उलझते सुलझते चित्र प्रस्तुत करते हैं।

आपके पैतृक गाँव में आपका प्रवास, संयुक्त परिवार और जमीन से जुड़े होने के कारण आपके साहित्य में  संस्कार और संस्कृति की रक्षा के लिए छटपटाहट सामने कथ्य में नजर आती है। शैल्पिक दृष्टिकोण से यह एक अनुपम लघुकथा संग्रह है जिसकी भाषा सौष्ठव पाठक मन को संतुष्ट करते हैं। भोपाल का साहित्य हिन्दी लघुकथा में '..... एक लोहार की' के जरिए अपना कदम मजबूती से जमा रहा है। आप से लघुकथा विधा की अपेक्षाएं बढ़ गई है। यह पुस्तक आपकी आने वाली कई लघुकथा संग्रह की कड़ियों के लिए एक शुरुआत बनेगी इस विश्वास के साथ अनंत शुभकामनाएँ आपको।

 

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