उज्जैन और क्षिप्रा की ठंडी सुबास है 'हँसी की चीखें'

 

उज्जैन और क्षिप्रा की ठंडी सुबास है 'हँसी की चीखें'-कान्ता रॉय 

 

हँसी की चीख: लघुकथा संग्रह

लेखक: संतोष सुपेकर

मूल्य:230

प्रकाशक:

अक्षरविन्यास

एफ-6/3,ऋषिनगर, उज्जैन

फोन:0734-2512591

ई-मेल:aksharvinyas@gmail.com

ISBN 978-93-85438-35-6

 


महाकाल की नगरी उज्जैयन धार्मिक व अध्यात्मिक होने के साथ लघुकथा संदर्भ में भी बेहद समृद्धशाली रही है।

यहाँ से विधा-सम्मत कार्य प्रकाशन के विविध माध्यम से लगातार होती रही है।

 वर्तमान में अन्य वरिष्ठ  लघुकथाकारों में संतोष सुपेकर जी भी रचनाधर्मिता का निर्वाह करते हुए, लघुकथा क्षेत्र में मजबूती बनाये हुए हैं।

सन् 1987 से लघुकथा में अपना योगदान देते हुए विधा के विकास में यह आपकी पाँचवीं मंजिल है जो हमारे हाथ "हँसी की चीखें" बनकर आयी है।

जैसा कि नाम से ही पुस्तक स्वंय में निहित विसंगतियों को मुखरित करती है, हँसी की आड़ लेती हुई तीव्र चीखों से त्रासदपूर्ण परिस्थितियों का एक नया स्वरूप सामने लाती है।

लेखन की प्रौढ़ता लिए हिन्दी गद्य साहित्य में विधा के परिपूर्ण करती यह पुस्तक अपनी लघुकथाओं में वैविध्य रूप में कथ्य को विस्तार देती है।

पुरोवाक् लिखते हुए 'समावर्तन' के सम्पादक वरिष्ठ साहित्यकार श्री राम दवे जी ने भी इंगित किया है कि " संग्रह की लघुकथाएँ सकारात्मक्ता से ओत-प्रोत होकर भी समकालीन आग्रहों-दुराग्रहों से सज्जित है।"

इंदौर-उज्जैन मध्यप्रदेश में लघुकथा की गढ़ मानी जाती रही है और संतोष जी उसी कड़ी का हिस्सा हैं।

 "हँसी की चीखें" लघुकथा संग्रह की प्रथम लघुकथा 'अर्जी' पढ़ते हुए मन द्रवित हो उठा। पिता और बेटे के रिश्तों की गर्माहट देखने को मिला जो बचपन में नन्हें-नन्हें हाथों से बेटे के द्वारा लिखित पर्ची पिता द्वारा संग्रहित कर अब तक रखी गयी थी।  यहाँ बचपन में लिखी छोटी-छोटी पर्चियाँ जिनमें पिता से वस्तु माँगना उल्लेखित था बेहद भावपूर्ण है। बुजूर्गावस्था में पिता को मनाना अपने साथ रहने के लिए वैसे ही एक पर्ची लिख कर उनकी जेब में डालना, ऐसा निश्छल सम्प्रेषण संतोष जी ही दे सकते हैं। लेखक अपनी रचनाओं द्वारा ही पहचान बनाता है। "जैसा खाये अन्न वैसा होये मन" के आधार पर लेखक का समाज के प्रति अनुरागी मन यहाँ सामने उभरकर आता है।

आपकी उक्त लघुकथा 'संरचना' 'पड़ाव और पड़ताल' में पंद्रहवें खंड में भी संकलित है जो इसकी उत्कृष्टता का निर्वाह सूचित करती है।

क्षेत्रवाद पर कटाक्ष करती लघुकथा 'ग्लोबल फिनॉमिना' का कथ्य सम्मोहित करता है कि "क्षेत्रवाद न अमेरिका को सहन होता है, न पड़ोसी या मित्र को!" लेखक का सामाजिक परिवेश पर महीन दृष्टि को चिन्हित करता है।

'भीगी हुई मुस्कान' जहाँ पति-पत्नी के बीच रिश्तों में बदलाव को सकारात्मक तरीके से कथ्य को चिन्हित करती है वहीं 'प्याज : दो रूदन कथाएँ' एक अति विशिष्ट शिल्प को सामने लेकर आती है।

'फितरत' गढ़ में उस दिन- निश्चित तौर पर सशक्त सम्प्रेषण है।

"हँसी की चीखें" लघुकथा जो पुस्तक की धुरी है, आम आदमी के जीवन में पल-पल रूप बदल कर आती परेशानियों को केन्द्र में रख कर बुना गया है जो इराक में शुरू कभी न खत्म होने वाले युद्ध के समान है से तालमेल करता कथ्य उभरकर आया है। विरोधाभास लिए सटीक चित्रण इस लघुकथा की बुनावट को विशिष्ट बनाती, शीर्षक के साथ भी पूर्ण न्याय करती है।

 'वह ऑक्सीजन!' बीमार माँ से उसके बेटे की मौत की खबर छुपा कर  झूठ के निर्वाह उनके लिए ऑक्सीजन के समान को कथ्य मिला है जो बेहद मार्मिक है।

 आपकी लघुकथाओं का मिजाज जितना सरल है उद्देश्य उतना ही तीव्रता लिए हुए है।

'शक्कर का अर्थ', 'नोट और संगत' 'अज्ञात तथ्य' सहित 'सुखद मोड़' 'बरसों बाद', 'टेस्टी नहीं पॉपकॉर्न' भी बेबाक तरीके से सम्प्रेषित हुआ है।

'सिविक सेंस' लघुकथा फौजी की पत्नी के अकेलेपन को कथ्य देता है। उक्त लघुकथा 'सृजन' पत्रिका एवम अर्य संदेश, पूर्णिया,बिहार में प्रकाशित हुआ है।

संवाद शैली में लिखी आपकी प्रायः सभी लघुकथाएँ विचार बिन्दु को लक्षित करती है।

'अंतहीन लाचारी' लघुकथा में ओलावृष्टि से हताश किसान के मानसिक द्वंद्व को भावानात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से तब उठान लेती है जब किसान प्रकृति और मालिक को गालियाँ देते हुए डंडा लेकर बिजूका को बदहवास होकर  पीटने लगता है।यहाँ संवेदनाओं का उद्वेग प्रत्यक्ष आँखों में तैर जाता है।

 संतोष सुपेकर जी पारिवारिक रिश्तों का ताना-बाना बड़ी गम्भीरता से बुनते हैं। सामाजिक संचेतना पर आपकी सभी लघुकथाएँ पाठक मन पर देर तक असर कायम करता है।

भाषा, शिल्प की दृष्टि से इसे आँकना पड़े तो मैं इसे वर्तमान समय की सोच और बोलचाल की लघुकथाएँ कहने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं है।

 'हँसी की चीखें' आमजन की लघुकथाओं को असाधारण तरीके से कथ्य के द्वारा स्पष्ट करती है।

लेखक पर अपने परिवेश का असर होता है इसलिए लघुकथाओं में मालवाणी मिजाज़ भी परिलक्षित होता है।

पुस्तक के आखिरी हिस्से में 'लघुकथा: विचारबिन्दु' के अंतर्गत लघुकथा को परिभाषित करती हुई वरिष्ठ लघुकथाकारों की  पंक्तियाँ उदधृत हैं जो पठनीय है।

 उज्जैयन और क्षिप्रा की ठंडी सुबास है "हँसी की चीखें"।

आपकी यह लघुकथा संग्रह आपके बौद्धिक दृष्टिकोण को प्रतिपादित करने में सफल रहीं है ऐसा मेरा मानना है।

 

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