लघुकथा साहित्य का राजमुकट है 'सफेद झूठ'

 

लघुकथा साहित्य का राजमुकट है 'सफेद झूठ' - कान्ता रॉय 

 

 


लघुकथा की लघुता और उसका अपरिमेय विस्तार आशाओं की ऊँची उड़ान भरने जैसी चीज़ है। यूँ तो लघुकथा को समझाने-समझने के लिए कोई संवैधानिक मापदंड नहीं है फिर भी अस्सी के दशक में डॉ. शकुन्तला किरण द्वारा पहली लघुकथा विधा में शोध करने के पश्चात एक प्रारूप तय हुआ जो विधा की कथ्य व्यवस्था की ठसक बनाए रखने के लिए कारगर साबित हुआ।

सन 1875 ई. में दबी-सहमी, विवशताओं, मुश्किल हालातों से जूझती अंततः अपने मनोविश्लेषणात्मक रेखांकन के सहारे मंजिल की ओर बढ़ती सन 1980 ई. के आसपास अत्यंत प्रभावी विधा के रूप में लघुकथा स्थिर हुई। बीसवीं सदी के इन्हीं आखिरी तीन दशकों में आलोचनाओं को झेलती हुई कुछ जुनूनी, समर्पित  साहित्यकारों, जिनमें स्थापित व नवोदित भी शामिल थे द्वारा इस दिशा में लघुकथा-विधा को श्रेष्ठ योगदान मिला। 

प्रकाशन के माध्यम बने एकल संग्रहों, पत्र-पत्रिकाओं व लघुकथा परिशिष्ट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

कथ्य एक ऐसा बीज-तत्व है जो सही कथानक रूपी जमीन में स्वयं ही अँखुराने लगती है अर्थात सही बीज के लिए सही कथानक का चुनाव कैसे किया जाना चाहिए, इसका सशक्त उदाहरण है 128 लघुकथाओं से लैस पुस्तक 'सफेद झूठ' 

नारनौल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. चितरंजन मित्तल जब भी कलम उठाते हैं तो रचना की सफलता आपके पीछे-पीछे चल पड़ती है। 

डॉ. चितरंजन मित्तल हृदय के चिकित्सक होने के दायित्व को अपनी पुस्तक 'दिल से दोस्ती' के जरिए निभाते हैं जो कि पुस्तक महल व यूनिकॉर्न द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसके लिए आपको  में पंजाब कला एवं साहित्य अकादमी द्वारा 'पंकस अकादमी अवॉर्ड' प्रदान किया गया है। 

'सफेद झूठ' लघुकथा संग्रह में शामिल प्रत्येक लघुकथा में कथ्य की प्रबलता ही उसकी सफलता बनती प्रतीत होती है। 

भारत, जो जगत का सबसे विराट जनतंत्र भी है, यहाँ जनता धार्मिक और आर्थिक रूप से विभिन्न सामाजिक विसंगतियों को झेलने को विवश है। भ्रष्टाचार के पीठ पर बैठ कर आतंकवाद ने जिस तरह से देशभर को प्रभावित कर रहा है। सामाजिक संचेतना जगाने हेतु डॉ. चितरंजन मित्तल की ओर से लघुकथा संग्रह 'सफेद झूठ' एक औषधि के समान भी है। 

'आश्वासन' लघुकथा में विदेश बसे बेटे का घर वापसी के लिए दिए गए आश्वासन के पीछे की गयी बहानेबाजी झूठा वादा करने वाले भ्रष्ट नेता की मानिंद लगना, यहाँ एक तीर से दो निशाने पर प्रहार किया गया है।

 'आदमी जिंदा है' इंसान अपने अवचेतन मन में अपने संचेतना को कैसे जीता है इसको कथ्य मिला है। पत्नी को मारता-कुटता, गाली-गलौज करने वाला व्यक्ति शराब पीने के कारण जो अपने होश में नहीं है अचानक अपने चाचाजी की उपस्थिति से, जिनके प्रति उसके मन में असीम श्रद्धा है वह सामान्य व्यवहार करने की कोशिश करता है व  चाचाजी के लिए उनके पसंद की कचौड़ियां लाने हलवाई के पास निकल  पड़ता है। यहाँ मानव मन के मनोविज्ञान को समझाने की कोशिश की गई है। 

'गले की जंजीर' चादर से बाहर पैर फैलाने की आदत यानी कि हैसियत से अधिक पाने की चाहत इंसान के जमीर को बेचने की कगार पर कैसे पहुंचा सकती है, इसे स्त्री के हार पाने की चाहत और उसके बॉस द्वारा पूरा करना फिर एवज में वासना पूर्ति के साधन के रूप में उसके उपभोग की कोशिश, यहाँ घृणा मालती को ही नहीं बल्कि पाठकों के मन में भी उपजने लगती है। 

'समरसता' में गंगा जमुनी तहजीब पर अर्थात भाईचारे पर राजनैतिक मतलब निकालने वालों द्वारा वैमनस्य पैदा करने की कोशिश के असर को भावपूर्ण अभिव्यक्ति मिली है। 'ओवरटाईम' लघुकथा के जरिए टेक्स्टाइल मिल में काम करने वाले कर्मचारियों की दिक्कतों को चिन्हित करते हुए लेखक ने बेटे के उज्जवल भविष्य के लिए पिता का संघर्ष को कथ्य दिया है। यहाँ टेक्स्टाइल मिल और वहाँ काम करने वाले कर्मचारियों के लिए लेखक का मन कितना संवेदनशील हो उठता है जब वह लिखते हैं कि, "उसको सौ फीट लम्बे चलते हुए कपड़े के साथ-साथ उकड़ू बैठ कर चलना होता था और कपड़ों की गुणवत्ता को परखना होता था।" इन पंक्तियों को पढ़ते हुए अनायास ही आँखें भर आती है। बेटे की पिता के प्रति असंवेदनशीलता को मार्मिकता के साथ उकेरा गया है।

जहाँ 'मुट्ठी से रेत' में माता-पिता को भुला बेटे का विदेश में हमेशा के लिए बस जाने को उभारने की कोशिश की गई है वहीं दूसरी ओर 'गुलामी का अनुबंध' में व्यवसाई द्वारा भोले-भाले मूर्तिकार का कागज पर अँगूठा लगा कर उसके कला का दोहन जैसी कुत्सित मानसिकता पर प्रहार हुआ है।

'मंत्री धर्म' में चाणक्य प्रसंग को व्याख्यादित करते हुए सम्माननीय होना, विश्वासपात्र होना नहीं होता है, इसको कथ्य के रूप में पाठकों के लिए चिंतन दिया है। कई बार ऐसी परिस्थिति निर्मित हो उठता है और हम तय नहीं कर पाते हैं कि अब हमारा आचरण कैसा हो? ऐसे में डॉ. चितरंजन मित्तल की लघुकथाएँ पथ-प्रदर्शक की भूमिका भी निभाती है। 'सन 2019' एक अति संवेदनशील लघुकथा है जिसका कथ्य है कि अगर विश्व शांति के लिए बने सभी अनुशासनों को तोड़ कर  पाकिस्तान की तरह भारत भी अगर बराबरी से छापामारी करने लगे और एक-दूसरे पर आक्रमण करने लगे तो परिणाम स्वरूप स्थिति ऐसी होगी कि, "अब एक डबल रोटी का पैकेट चार सौ रु का भारत में मिल रहा था ,और पाक में छह रु का। दोनों तरफ युद्ध के शरणार्थी कैम्पों में त्राहि त्राहि मची थी। भारत की आर्थिक प्रगति रुक गयी थी। जनता रो रही रही थी। अब पाक कट्टरपंथी पछता रहे थे। भारत के भावनात्मक मूर्ख अब हाथ मल रहे थे। भारत और पाक दोनों को पूरा विश्व धिक्कार रहा था। इतिहास में सबसे मूर्ख देशो की श्रेणी में पाक और भारत का नाम दर्ज हो चुका था।" 

यहाँ लघुकथा के सहारे लेखक की कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े हो गए हैं। 

'प्रेम का फलसफा' घर जवाँई बने बेटे के लिए पिता के मन के कचोट को शाब्दिक अर्थ दिया गया है।

'चीटियाँ' मृतक के प्रति मनुष्य के व्यवहार को चींटियों के व्यवहार से तुलनात्मक रूप से कथ्य मिला है। 

ऐसे सैंकड़ों कथ्य हमारे आसपास विचरते हैं लेकिन उसको पकड़ने की क्षमता सिर्फ चिंतनशील व्यक्ति के द्वारा ही सम्भव है।

'एक और कबीर' वैज्ञानिक की मौत हो या कबीर की, मानव धर्म पर केन्द्रित कथ्य को अलग तरीके से कहा गया है। 

'चाचा' बनाने की प्रवृत्ति को व्यंग्यात्मक लहजे में लिखा गया है। रास्ते भर सहयात्री से बस में ठगी में मिली सफलता के बाद जब विजेता भाव में अपने घर पहुँचते हैं तो वे पाते हैं कि "उनके कुर्ते की जेब कट गयी थी। एक पर्ची मिली उसमे लिखा  था, ’’आप कितने ही चाचा बन लो ,दुनिया में हरेक आदमी का चाचा होता है।’’ 

 

'छोटा आदमी' नास्तिकता और आस्था के बीच सेफ साईड तलाशता मानव, भगवान द्वारा नाराजगी से अनहोनी हो जाने के डर से पूजा पाठ भी कर ही लेना, विचारों में एक अजीब संकीर्णता को सामने खींच कर लाया गया है। दुश्मनी, आरक्षण का मेघावी, अध्यापक, दावत, धरती माता का पुत्र, इत्यादि लघुकथाओं में समाजिक विसंगतियों के विविध रूप सामने आते हैं। लेखक द्वारा समाज में दायित्व बोध जगाने का प्रयास सफलता पूर्वक किया गया है।

 'दहेज' में मानसिक विद्रुपता के हावी होने को विस्तार मिला है। बेटी का घर, जन नेता, भुतहा मकान, स्वयं के स्वार्थपूर्ति के लिए साजिश करने की मनोवृत्ति किस तरह से प्रतिपादित की जाती है, इसे सफलतापूर्वक लेखक गढ़ते हैं।

 'सीख' एक नैतिक मूल्यों को स्थापित करने वाली लघुकथा है जहाँ माँ द्वारा दी गई सीख जीवन के मार्ग को प्रशस्त करती है। घर व्यक्ति के जीवन की पहली पाठशाला कहा गया है। अगर सीख में हर बच्चे को यह सम्पदा माँ द्वारा मिले तो दुनिया में कोई विसंगतियों का आना ही न हो। एक मजबूत स्तम्भ से ही जीवन को मजबूत आधार मिलता है, यह लेखक द्वारा कथ्य के अनकहे में बार बार रोपित होना प्रतीत होता है।

'अमानवीय डॉक्टर' लघुकथा में 'डॉक्टर भगवान होता है' को केन्द्र में रखकर अस्पताल में डॉक्टरों द्वारा इलाज में हुई कोताही बरतने के कारण हुए भाई की मृत्यु पर परिजनों द्वारा रोष को गजब तरीके से सम्प्रेषित किया गया है। 

"अरे साब उसका तो भाई मर गया। अगर दुखी आदमी एक थप्पड़ भी मार दे तो कोई बार नहीं। आप तो भगवान हो माफ कर दो।’’ ---- बीच-बचाव करने वाले के जरिए यह संवाद इस लघुकथा को श्रेष्ठतम अवस्था में लेकर जाता है। यहाँ डॉ. चितरंजन मित्तल की कलम की ताकत उसके कथ्य की पैनी धार से नापी जा सकती है कि सामने वाले को पता भी ना चले और गर्दन चाक हो जाए। 

'शवयात्रा' लघुकथा में पैसा कमाने के मुकाबले सेवा की भावना का महत्व को शवयात्रा की लम्बाई से जीवन की उपलब्धियों को जोड़ता कथ्य मन को विश्वास दिलाता है कि मानवीय मूल्यों से बढ़कर सुंदर कोई दूसरी चीज इस दुनिया में नहीं है।

'दूर्गा' एक विकृत मानसिकता को दर्शाता है जहाँ भाई-बहन जैसी पवित्र रिश्ते को भी नहीं छोड़ा जाता है। 

इसी तरह से प्रतिपादित अलग-अलग रंग नासमझ की समझ, सजा, रतन लाल रेट्स इत्यादि लघुकथाओं में देखने को मिलता है। 

कुर्सी और भ्रष्टाचार को 'कुर्सी' में, अनुभवी  'मुक्केबाज' की शिकस्तगी उसके गरीबी द्वारा को मार्मिकता से रखा गया है। 

 

लघुकथा विधा पर काम करते हुए अनगिनत पुस्तक मेरे सामने आए हैं। उन सभी को अगर सामने रख कर इस पुस्तक के बारे में निष्पक्षता से सिर्फ एक पंक्ति कहना पड़ जाए तो बस यही कहूँगी कि

'सफेद झूठ' लघुकथा संग्रह, लघुकथा साहित्य का यह राजमुकुट है। इसको कहने के पीछे मेरी पुस्तक पर गहन अध्ययन व तार्किक विश्लेषण का मजबूत आधार है।  पुस्तक में लगभग सभी लघुकथाएँ मानकों पर खरी, कसी, अंधकार की छाती चीरने वाली बिजली की कौंध को स्वयं में समाहित किए है।

भविष्य के प्रति सचेत करती कि हमें कैसा समाज चाहिए, नव निर्माण के लिए हमारी सोच किस दिशा में प्रस्थान करें इत्यादि सभी प्रश्नों का जवाब है 'सफेद झूठ'

 पिछले कई सालों से हमनें साथ मिलकर लघुकथा विधा में काम किया है। डॉ. चितरंजन मित्तल लग्नशील, तटस्थ, नव परम्परा को गढ़ने वाले बिलकुल साफ़ दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति हैं। प्रत्येक  लघुकथा मुट्ठियों में भींची हुई, बेहद कसी हुई पाठक मन को बाँध कर उसकी सहयात्री बनती है। 128 लघुकथाओं का यह संग्रह चिंतन-मनन द्वारा प्रशवित शुभ्र मोतियों की लड़ है जो अपने कथ्य, कथानक और शीर्षक की दृष्टि से सटीक गढ़न लिए हुए है। 

मैं डॉ. चितरंजन मित्तल को 'लघुकथा संग्रह' श्रृंखला में इस प्रथम कड़ी के लिए शुभकामनाएँ व विधा के विकास में सहायक इस पुस्तक की देयता पर आभार प्रकट करती हूँ। 

 

कान्ता रॉय

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